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________________ तृतीयं पर्व साधु नाथावबुद्धं ते त्रैलोक्यहितकारणम् । विच्छिन्नस्य महाकालो मोक्षमार्गस्य वर्तते ॥२६९॥ एते विपरिवर्तन्ते भवदुःखमहार्णवे । उपदेशस्य दातारमन्तरेणासुधारिणः ॥२७॥ व्रजन्तु सांप्रतं जीवा देशितेन पथोत्वया । युक्तमक्षयसौख्येन लोकाग्रेऽवस्थितं पदम् ॥२७१॥ इति तस्य प्रबुद्धस्य स्वयमेव महात्मनः । सुरैरु दाहृता वाचः प्रयाताः पुनरुक्तताम् ॥२७२॥ इति निष्क्रमणे तेन चिन्तिते तदनन्तरम् । आगताः पूर्ववद्देवाः पुरन्दरपुरस्सराः ॥२७३॥ आगत्य च सुरैः सर्वैः स्तुतः प्रणतिपूर्वकम् । चिन्तितं साधु नाथेति भाषितं च पुनः पुनः ॥२७॥ 'ततो रत्नप्रमाजालजटिलीकृतदिङ्मुखाम् । चन्द्रांशुनिकराकारप्रचलच्चारुचामराम् ॥२७५॥ पूर्णचन्द्रनिमादर्शकृतशोभा सबुबुदाम् । अर्द्धचन्द्रकसंयुक्तामंशुकध्वजभूषिताम् ॥२७६॥ दिव्यस्रग्भिः कृतामोदां मुक्ताहारविराजिताम् । सुदर्शनां विमानामा किङ्किणीभिः कृतस्वनाम् ॥२७७॥ सरनाथापित स्कन्धां देवशिल्पिविनिर्मिताम् । आरुह्य शिविकां नाथो निर्जगाम निजालयात् ॥२७॥ ततः शब्देन तूर्याणां नृत्यतां च दिवौकसाम् । त्रिलोकविवरापूरश्चक्रे प्रतिनिनादिना ॥२७९॥ ततोऽस्यन्तमहाभत्या भक्त्या देवैः समन्वितः। तिलकाह तमद्यान संप्राप जिनपुङ्गवः ॥२८॥ प्रजाग इति देशोऽसौ प्रजाभ्योऽस्मिन् गतो यतः । प्रकृष्टो वा कृतस्त्यागः प्रयागस्तेन कीर्तितः ॥२८१॥ आपृच्छनं ततः कृत्वा पित्रो बन्धुजनस्य च । नमः सिद्धेभ्य इत्युक्त्वा श्रामण्यं प्रत्यपद्यत ॥२८२॥ तरह यहाँ भगवान्का चित्त शुभ विचारमें लगा हुआ था कि वहाँ उसी समय लौकान्तिक देवोंने आकर निम्न प्रकार निवेदन करना प्रारम्भ कर दिया ॥२६८।। वे कहने लगे कि हे नाथ! आपने जो तीन लोकके जीवोंका हित करनेका विचार किया है सो बहुत ही उत्तम बात है। इस समय मोक्षका मार्ग बन्द हए बहत समय हो गया है॥२६९॥ ये प्राणी उपदेश-दाताके बिना संसाररूपी महासागरमें गोता लगा रहे हैं ।।२७०।। इस समय प्राणी आपके द्वारा बतलाये हुए मार्गसे चलकर अविनाशी सुखसे युक्त तथा लोकके अग्रभागमें स्थित मुक्त जीवोंके पदको प्राप्त हों ॥२७१।। इस प्रकार देवोंके द्वारा कहे हुए वचन स्वयम्बुद्ध भगवान् आदिनाथके समक्ष पुनरुक्तताको प्राप्त हुए थे ॥२७२॥ ज्यों ही भगवान्ने गृहत्यागका निश्चय किया त्यों ही इन्द्र आदि देव पहलेकी भाँति आ पहुंचे ॥२७३।। आकर समस्त देवोंने नमस्कारपूर्वक भगवान्की स्तुति की और 'हे नाथ ! आपने बहुत अच्छा विचार किया है' यह शब्द बार-बार कहे ।।२७४।। तदनन्तर, जिसने रत्नोंकी कान्तिके समूहसे दिशाओंके अग्रभागको व्याप्त कर रखा था, जिसके दोनों ओर चन्द्रमाकी किरणोंके समूहके समान सुन्दर चमर ढोले जा रहे थे, पूर्ण चन्द्रमाके समान दर्पणसे जिसकी शोभा बढ़ रही थी, जो बुवुदके आकार मणिमय गो सहित थी, अर्द्धचन्द्राकारसे सहित थी, पताकाओंके वस्त्रसे सुशोभित थी, दिव्य मालाओंसे सुगन्धित थी, मोतियोंके हारसे विराजमान थी, देखने में बहुत सुन्दर थी, विमानके समान जान पड़ती थी, जिसमें लगी हुई छोटी-छोटी घण्टियाँ रुन-झुन शब्द कर रही थीं, और इन्द्रने जिसपर अपना कन्धा लगा रखा था ऐसी देवरूपी शिल्पियोंके द्वारा निर्मित पालकीपर सवार होकर भगवान् अपने घरसे बाहर निकले ॥२७५-२७८|| तदनन्तर बजते हुए बाजों और नृत्य करते हुए देवोंके प्रतिध्वनि पूर्ण शब्दसे तीनों लोकोंका अन्तराल भर गया ।।२७९।। बहुत भारी वैभव और भक्तिसे युक्त देवोंके साथ भगवान् तिलक नामक उद्यानमें पहुँचे ।।२८०॥ भगवान् वृषभदेव प्रजा अर्थात् जन समहसे दूर हो उस तिलक नामक उद्यान में पहुंचे थे इसलिए उस स्थानका नाम 'प्रजाग' प्रसिद्ध हो गया अथवा भगवान्ने उस स्थानपर बहुत भारी याग अर्थात् त्याग किया था, इसलिए उसका नाम 'प्रयाग' भी प्रसिद्ध हुआ ।।२८१।। वहाँ पहुँचकर भगवान्ने माता-पिता तथा बन्धुजनोंसे दीक्षा लेनेकी आज्ञा ली और फिर 'नमः सिद्धेभ्यः'-सिद्धोंके लिए १. त्रैलोक्ये म.। २. यथा म. । ३. ताररत्न- ख.। ४. प्रतिपद्यत म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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