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________________ ५, ६, ११६) बंधणाणुयोगद्दारे जवमज्झपरूवणा (२०५ सलागाओ। एगवग्गणदुगुणहाणिट्ठाणंतरमणंतगुणं । को गुणगारो ? सव्वजीवेहि अणंतगणो। अवहारो ण सक्कदे णेदुं । कुदो? णिरंतरवड्ढीए हाणीए वा वग्गणाणं गमणाणुवलंभादो । अथवा सरिसघणियवग्गणाओ छंडेदूण विसेसाहियवग्गणाओ चेव घेत्तूण भण्णमाणे अवहारो सक्कदे वोत्तुं । तं जहा-* जवमज्झस्सुवरिमअसंखेज्जगुणहाणिदव्वे जवमज्झपमाणे कीरमाणे दिवडगुणहाणिमेत्ताणि जवमज्झाणि होति । हेटिम असंखज्जगुणहाणिदव्वे वि जवमझपमाणेण कीरमाणे दिवड्ढगुणहाणिमेत्तजवमज्झाणि होति । पुणो दोसु वि दम्वेसु एगट्टमेलिदेसु तिण्णिगुणहाणिमेत्तजवमज्झाणि होति । संपहि जवमज्झपमाणेण सव्वदव्वं केवचिरेण कालेण अवहिरिज्जदि ? तिण्णिगुणहाणिट्टाणंतरेण आवलिए असंखे०भागपमाणेण कालेण अवहिरिज्जदि । संपहि अभवसिद्धियपाओग्गसव्वजहण्णवग्गणपमाणेण सव्वदव्वं केवचिरेण कालेण अवहिरिज्जदि ? असंखेज्जतिणि* गुणहाणिढाणंतरेग कालेण अवहिरिज्जदि । तं जहा-जवमज्झादो हेट्ठा आवलियाए असंखे० भागमेत्ताओ णाणागुणहाणिसलागाओ होति । पुणो एदाओ विरलिय बिगुणिय अण्णोण्णब्भत्थे कदे उप्पण्णरासिपमाणं पि आवलियाए असंखे०भागमेत्तं चेव होदि । कुदो? जवमझे जह ण द्वाणे वि आ व लि या ए असं खे ० भा ग मे ता णं शलाकायें सबसे स्तोक हैं । इनके एकवर्गणाद्विगुणहानिस्थानान्तर अनन्तगुणा है । गुणकार क्या हैं ? सब जीवोंसे अनन्तगुणा गुणकार है । अवहार ले जाना शक्य नहीं है, क्योंकि, निरन्तर वृद्धि और निरन्तर हानिरूपसे वर्गणाओंका सिलसिला नहीं उपलब्ध होता है । अथवा सदृश धनवाली वर्गणाओंको छोडकर विशेषाधिक वर्गणाओंको ही ग्रहण करके कथन करने पर अवहारका कथन करना शक्य है । यथा यवमध्यसे उपरिम असंख्यातगुणहानिके द्रव्यको यवमध्यके प्रमाण करने पर डेढ़ गुणाहानिमात्र यवमध्य होते हैं । अधस्तन असंख्यातगुणहानिके द्रव्योंको भी यवमध्यके प्रमाणसे करनेपर डेढ़ गुणहानिमात्र यवमध्य होते हैं । पुनः दो द्रव्योंको भी इकठ्ठा मिलाने पर तीन गुणहानिमात्र यवमध्य होते हैं । अब यवमध्यके प्रमाणसे सब द्रव्य कितने काल द्वारा अपहृत होता है ? तीन गुणहानिस्थानान्तररूप आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण काला द्वारा अपहृत होता है । अब अभव्योंके योग्य सबसे जघन्य वर्गणाके प्रमाणसे सब द्रव्य कितने कालके द्वारा अपहृत होता है ? असंख्यात त्रिगुणहानिस्थानान्तर कालकें द्वारा अपहृत होता है । यथा-यवमध्यके नोचे आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण नानागुणहानिशलाकायें होती हैं। पुनः इनका विरलन कर और द्विगुणित कर परस्पर गुणा करने पर उत्पन्न हुई राशिका प्रमाण भी आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण ही होता है, क्योंकि, यवमध्यरूप जघन्य स्थानमें भी आवलिके प्रतिषु ‘एवं वग्गण-' इति पाठः ॐ अ-आ प्रत्योः 'छड्डेदूण' इति पाठ; 1 * म. प्रतिपाठोऽयम् । ता०अ०प्रत्योः 'वोत्तुं जत्तं जहा' का०प्रतो वोत्तुं उत्तं जहा' इति पाठः । ॐ ता०प्रतौ 'जवमज्झपमाणेण' कीरमाणे दिवड्ढगणहाणिमेतजवमज्झाणि होति । पुणो सव्वदच' इति पाठः। -*- म०प्रतिपाठोऽयम् । प्रतिष 'अवहिरिज्जदि ? असंखेज्ज तिण्णि' इति पाठः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001813
Book TitleShatkhandagama Pustak 14
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorHiralal Jain, Fulchandra Jain Shastri, Balchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year1994
Total Pages634
LanguagePrakrit, Hindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Karma
File Size15 MB
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