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________________ ३२ ) छ खंडागमे वग्गणा-खंडं ( ५, ३, २८ फुसिज्जति ।१। वेउव्वियसरीरणोकम्मपदेसा तिरिवख-मणुस्सेसु ओरालियसरीरणोकम्मपदेसेहि फुसिज्जति ।२। वेउव्वियसरीरणोकम्मपदेसाणं पमत्तसंजदढाणे आहारसरीरणोकम्मपदेसेहि सह फासो णस्थि । कुदो? पमत्तसंजदस्स अणिमादिलद्धिसंपण्णस्स विउव्विदसमए आहारसरीरुट्टावणसंभवाभावादो। वेउब्वियसरीरणोकम्मपदेसा चदुगदीसु तेयासरीरणोकम्मपदेसेहि फुसिज्जंति ।३। वेउव्वियसरीरणोकम्मपदेसा चदुगदीसु कम्मइयसरीरपदेसेहि फुसिज्जंति।४। एवं वे उब्वियसरीरस्स चत्तारि भंगा। पुणो एदेसु पुव्वभंगेसु पक्खित्तेसु णव भंगा होति ।९।। ___आहारसरीरणोकम्मपदेसा पमत्तसंजदट्ठाणे आहारसरीरणोकम्मपदेसेहि फुसिज्जति ।१। आहारसरीरणोकम्मपदेसा पमत्तसंजदेसु ओरालियसरीरणोकम्मपदेसेहि फुसिज्जंति ।२। आहार-वे उब्वियसरीराणमण्णोण्णेहि णत्थि फासो, आहारसरीरमाविदकाले विउवणाभावादो। आहारसरीरणो कम्मपदेसा पमत्तसंजदट्ठाणे तेयासरीरणकम्मपदेसेहि फुसिज्जंति, अणिस्सरणप्पयस्स तेजइयसरीरस्त गोकम्माणं सव्वद्धं जीवे सत्तुवलंभादो।३। आहारसरोरणोकम्मपदेसा पमत्तसंजदेसु कम्मइयसरीरकम्मपदेसेहि फुसिज्जंति, अढण्णं कम्माणं पमत्तसंजदेसु सव्वद्धं सत्तुवलंभादो।४। एवमाहारसरीरस्स चत्तारि भंगा। एदेसु पुव्वभंगेसु पक्खित्तेसु तेरस भंगा होति ।१३। स्पर्श किये जाते हैं। १। वैक्रियिक शरीर नोकर्म प्रदेश तिथंच और मनुष्योंमें औदारिक शरीर नोकर्म प्रदेशोंके द्वारा स्पर्श किये जाते हैं। २। वैक्रियिक शरीर नोकर्म प्रदेशोंका प्रमत्तसयत गुणस्थानमें आहारक शरीर नोकर्म प्रदेशोंके साथ स्पर्श नहीं है, क्योंकि, अणिमा आदि लब्धियोंसे सम्पन्न प्रमत्तसंयत जीवके विक्रिया करते समय आहारक शरीरको उत्पत्ति सम्भव नहीं है । बैंक्रियिक शरीर नोकर्म प्रदेश चारों गतियों में तेजस शरीर नोकर्म प्रदेशों के द्वारा स्पर्श किये जाते हैं। ३ । वैक्रियिक शरीर नोकर्म प्रदेश चारों गतियोंमें कार्मण शरीर प्रदेशोंके द्वारा स्पर्श किये जाते हैं। ४ । इस प्रकार वैक्रियिक शरीरके चार भंग होते हैं। फिर इन्हें पूर्वोक्त पांच भंगोंमें मिला देनेपर नौ भंग होते हैं । ९। आहारक शरीर नोकर्म प्रदेश प्रमत्तसंयत गुणस्थान में आहारक शरीर नोकर्म प्रदेशोंके द्वारा स्पर्श किये जाते हैं। १। आहारक शरीर नोकर्म प्रदेश प्रमत्तसंयत गुणस्थान में औदारिक शरीर नोकर्म प्रदेशोंके द्वारा स्पर्श किये जाते हैं । २। आहारक शरीर और वैक्रियिक शरीरका परस्परमें स्पर्श नहीं होता, क्योंकि, आहारक शरीरके उत्थानकालमें विक्रिया नहीं होती। आहारक शरीर नोकर्म प्रदेश प्रमत्तसंयत गुणस्थान में तेजस शरीर नोकर्म प्रदेशोंके द्वारा स्पर्श किये जाते हैं, क्योंकि, अनिःसरणात्मक तेजस शरीरके नोकर्म प्रदेशोंका जीवके सदाकाल सत्त्व पाया जाता है। ३ । आहारक शरीर नोकर्म प्रदेश प्रमत्तसंयत जीवोंमें कार्मण शरीर नोकर्म प्रदेशोंके द्वारा स्पर्श किये जाते हैं, क्योंकि आठों कर्मोंकी प्रमत्तसंयत जीवोंके सदाकाल सत्ता पाई जाती है । ४ । इस प्रकार आहारक शरीरके चार भंग होते हैं। इन्हें पहलेके नौ भंगों में मिलानेपर तेरह भंग होते हैं । १३ । ताप्रतौ ' -रारी रणोकम्म' इति पाठः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org .
SR No.001812
Book TitleShatkhandagama Pustak 13
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorHiralal Jain, Fulchandra Jain Shastri, Balchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year1993
Total Pages458
LanguagePrakrit, Hindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Karma
File Size11 MB
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