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________________ हिन्दी अनुवाद-अ.३, पा. ४ २८३ लटो हि वा झझ्योः ॥ ५१ ।। लट् के यानी वर्तमानकालके परस्मैपद और आत्मनेपद इनके प्रथमः पुरुष बहुवचनोंके स्थानपर अपभंशमें हिं ऐसा आदेश विकल्पसे होता है । उदा. होहिं हुवहिं हवहिं, भवन्ति । विकल्पपक्षमें न्ति, न्ते और इरे (प्रत्यय, होते हैं)। उदा. मुहक बरिबंध तहे सोह धरहिँ [३७] ॥ ११ ॥ हि थास्सिपोः ॥ १२ ॥ लट् (वर्तमानकाल) के मध्यमपुरुष एकवचनके थास् और सिप (प्रत्ययों)को अपभंशमें हि ऐसा आदेश विकल्पसे होता है । उदा. होहि हवहि हुवहि, भवसि । विकल्पपक्षभे-से और सि (प्रत्यय होते हैं) ॥ ५२ ॥ बप्पीहा पिउपिउ करवि केत्तिउँ अहि हआस । तुह जळि महु पुणु वल्लहइ बिहुँ वि न पूरिअ आस ।। १४४ ॥ (=हे. ३८३.१) (चातक 'पिउ पिउ' कृत्वा कियद् रोदिषि हताश । तव जले मम पुनर्बलभे द्वयोरपि न पूरिता आशा ॥) हे चातक, पीऊँगा पीऊँगा (और प्रिय प्रिय) (पिउ पिउ) ऐसा कहते हे हताश, कितना रोओगे ? (हमें ) दोनोंकी-जल के बारे में तुम्हारी और प्रियकरके बारेमें मेरी-आशा पूरी नहीं होती है । (यहाँ) पिउ पिउ ये रूप पिबाम, शब्दसे अथवा प्रियप्रिय शब्दसे अपशमें सिद्ध होते हैं । - आत्मनेपदमेंबप्पीहा काइँ बोल्लिएण निग्विण वार इ वार । साभरि भरिअइ विमलजाल लहाह न एक वि धार ॥१४५॥ (=हे. ३८३.२), ___ (चातक किमुक्तेन निघृण वारंवारम् । .. सागरे भृते विमलजलेन लभसे नैकामपि धाराम् ॥) हे निघृण चातक, बारबार (तुझे) कहनेसे क्या उपयोग । विमल जलसे सागरके भरे रहनेपरभी, एक भी बूंद (धाग) उसमेंसे तुझे नहीं मिलती। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001735
Book TitlePrakritshabdanushasanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTrivikram
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year1973
Total Pages360
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Grammar
File Size19 MB
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