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दिट्ठ उर-स्थल फाडिउ चक्के श्रवणियलु व विञ्ण विहञ्जिउ
सो मुउ जो मय-मत्तउ वय-चारित - विहूरणउ सरणाइय- वन्दिग्गहें गोग्गहँ
रिय-परिहवें पर बिरें रग जुज्जइ प्रणु इक्किय-कम्म-जणेरउ
सव्वंसह वि सहेवि र सक्कइ des वाहिरिण कि मइँ सोसहि छिज्जमारण वरणसइ उग्धोसइ पवणु र भिडइ भाणु कर खञ्चइ विन्धइ कण्टेहिँ व दुव्वय रोहिं
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धत्ता - पेक्खवि रामेण समरङ्गणें रामण ( हों) मुहाइँ । प्रालिङ्ग प्पिणु धीरिउ 'रुवहि विहीसण काई || 12
77.2
दिर - मज्भु अ ( ? ) मज्झत्यें क् ॥ 10 णं विहिँ भाऍहिँ तिमिरु व पुञ्जिउ ||11
धत्ता - धम्म
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जीव- दया परिचत्तउ । दारण - रणङ्गणें दी उ सामि श्रवसरें मित्त-परिग्गहें ॥ 2 तेहउ पुरिसु विहीसण रुज्जइ ॥ 3 गरुग्रउ पाव भारु जसु केरउ ॥ 4
गाउ मरणन्ति र थक्कइ ॥ 5 धाहावइ खज्जन्तो श्रसहि ॥ 6 कइयहुँ भरणु गिरासहों होसइ ॥ 7 धणु राउल चोरग्गिहुँ सञ्चइ || 8 विस-रुक्खु व मण्खिज्जइ सय रोहिं ॥ 9
म - बिहूरणउ पाव- पिण्डु प्रणिहालिय- यामु | सो रोवेवर जासु महिस- विस मेसहिँ सामु ॥ 10
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[ अपभ्रंश काव्य सौरभ
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