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________________ चौबीसवाँ पाठ वर्तमान कृदन्त मूल धातु में 'न्त', 'माण' और 'ई' प्रत्यय लगाने से उसके वर्तमान कृदन्त रूप बनते हैं । परन्तु 'ई' प्रत्यय केवल स्त्रीलिङ्ग में ही प्रयुक्त होता है। 'न्त', 'माण' और 'ई' प्रत्यय परे रहते पूर्व के 'अ' को विकल्प से 'ए' होता है। न्तभए + न्त-भवंतो, भणेतो, भरिणतो, (भएन्) = पढ़ता हुआ। भणंत, भणेतं, भरिंगतं (भणन्) = पढ़ता हुआ। भणंतो', भणेती, भणिती, (भणन्ती)= पढ़ती हुई। भयंता, भणेता, भरिणता' (भणन्ती) = ,, ,, हो + अ + न्त-होघेतो, होएंतो, होइंतो (भवन्) = होता हुआ । होतो, हुंतो होतं, होतं, होइंतं (भवत्) = होता हुआ। होतं, हुतं होअंती, होएंती, होइंती (भवन्ती) = होतो हुई। होअंता, होएंता, होइता ( ,, )= , होती, होता हुती, हुता १. हे० प्रा० व्या० ८।३।१८१६ तथा १८२ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001702
Book TitlePrakritmargopadeshika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBechardas Doshi
PublisherMotilal Banarasidas
Publication Year1968
Total Pages508
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Grammar
File Size16 MB
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