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________________ दसवाँ अध्याय } [ ९७ अर्थः-जो मनुष्य प्रति समय निरहंकारताकी बुद्धि करते रहते हैं, अहंकार नहीं करते; उन्हें निस्संदेह अद्वैतस्वरूप म्वचिद्रूपकी प्राप्ति होती है ।। ४ ।। न देहोऽहं न कर्माणि न मनुष्यो द्विजोऽद्विजः । नैव स्थूलो कृशो नाहं किंतु चिद्रूपलक्षणः ॥ ५ ॥ चिंतनं निरहंकारी भेदविज्ञानिनामिति । स एव शुद्धचिद्रपलब्धये कारणं परं ॥ ६ ॥ युग्मं ।। अर्थः-जो मनुष्य भेदविज्ञानी हैं, जड़ और चेतनका वास्तविक भेद जानते हैं उनका न मैं देहस्वरूप हूँ, न कर्मस्वरूप हूँ, न मनुष्य हूँ, न ब्राह्मण हूँ, न क्षत्रिय आदि हूँ, न स्थूल हूँ, और न कृश हूँ; किन्तु शुद्धचिद्रूप हूँ-इस प्रकारका चितवन करना निरहंकार “ अहंकारका अभाव" है और यह निरहंकार शुद्धचिद्रूपकी प्राप्तिमें असाधारण कारण है ।। ५-६ ।। ममत्वं ये प्रकुवंति परवस्तुषु मोहिनः । शुद्धचिद्रूपसंप्राप्तिस्तेषां स्वप्नेऽपि नो भवेत् ॥ ७ ॥ अर्थ:-जो मूढ़ जीव परपदार्थों में ममता रखते हैं, उन्हें अपनाते हैं----उन्हें स्वप्नमें भी शुद्धचिद्रूपकी प्राप्ति नहीं हो सकती । भावार्थ:-संसारमें सिवाय शुद्धचिद्रूपके अपना कोई पदार्थ नहीं । स्त्री, पुत्र, मित्र आदि सब परपदार्थ हैं, इसलिये जो जीव निजशुद्धचिद्रूपकी प्राप्ति करना चाहते हैं उन्हें परपदार्थोंमें किसी प्रकारका ममत्व नहीं रखना चाहिये ।।७।। त. १३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001638
Book TitleTattvagyan Tarangini
Original Sutra AuthorGyanbhushan Maharaj
AuthorGajadharlal Jain
PublisherDigambar Jain Swadhyay Mandir Trust
Publication Year
Total Pages184
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Spiritual
File Size9 MB
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