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________________ अश्वकर्णकरणके द्वितीयादि समयसम्बन्धी प्ररूपणा ३९५ द्रव्य दीजिए है। ऐसे ही चतुर्थादि समयनिविषै भी जानना। इहां विवक्षित समयविषै जे अपूर्व स्पर्धक बनें ते तो अपकर्षण कीया द्रव्यविषै केते इक द्रव्यतै ब. अर तिनके ऊपरि जे स्पर्धाक हैं ते पूर्वं थे ही। बहुरि तिन सवनिवि अवशेष द्रव्य विभाग करि दीया तातै निज कालविषै बने अपूर्व स्पर्धाककी अंत वर्गण विषै दीया द्रव्यतै अनंतर वर्गणाविर्षे असंख्यातगुणा घटता द्रव्य दीया कह्या, अन्यत्र चय घटता क्रम लीएं कह्या है ॥४७९।। पढमादिसु दिस्सकम तत्कालजफड्ढयाण चरिमो त्ति । हीणकम से काले हीणं हीणं कम तत्तो' ॥४८०॥ प्रथमादिषु दृश्यक्रमं तत्कालजस्पर्धकानां चरम इति । हीनक्रमं स्वे काले होनं होनं क्रमं ततः ॥४८०॥ स० चं०-अपूर्वस्पर्धक करणकालका प्रथमादि समयनिविषै दृश्य कहिए देखने में आवै ऐसा परमाणूनिका प्रमाण ताका अनुक्रम सो दृश्यक्रम कहिए । सो कैसे है ? सो कहिए है तहाँ तिस विवक्षित समयविष बने अपूर्व स्पर्धक तिनका तो जो देय द्रव्य सो ही दृश्य द्रव्य है । जाते तिस समय अपकर्षण कीया द्रव्य हीतै तिनकी रचना भई हैं। सो तिनकी प्रथम वर्गणातें लगाय अंत वर्गणापर्यंत विशेष घटता क्रम लीए दृश्य द्रव्य है। बहुरि तिस अंत वर्गणाके द्रव्यतै ताके ऊपरि जो वर्गणा तिसका भी दृश्य द्रव्य एक चयमात्र घटता है जातें दीया द्रव्य तौ तिस अंत वर्गणा द्रव्यतै असंख्यातगुणा घटता है तथापि दीया द्रव्य अर पूर्वं वाका सत्तारूप पुरातन द्रव्य दोऊ मिलि तिसतै एक चयमात्र घटता दृश्य द्रव्य हो है। बहुरि ताके उपरि पूर्वस्पर्धककी अंत वर्गणा पर्यंत दीया द्रव्य अर पूर्व द्रव्य मिलि क्रमतें चय प्रमाण करि घटता दृश्य द्रव्य जानना। ऐसे विवक्षित समयविष कीए अपूर्वस्पर्धक तिनकी प्रथम वर्गणातें लगाय पूर्वस्पर्धकनिकी अंत वर्गणा पर्यंत एक गोपुच्छ भया तातै तहाँ चय घटता क्रम लीएं ही दृश्य द्रव्य जानना। ऐसैं अश्वकर्णकरणकालका प्रथमादि समयनिविर्षे यावत् प्रथम अनुभाग कांडकका घात न होइ तावत् स्थितिकांडक अनुभाग कांडक स्थितिबंध अनुभाग सत्त्व तौ तिन समयनिविर्षे समान रूप है। अर अप्रशस्तकर्मनिका अनुभागबंध समय-समय अनंतगणा घटता है। अर गणश्रेणि विषै समय-समय असंख्यातगणा द्रव्यकौं अपकर्षणकरि दीजिए है। अर अतीत समयसंबंधी स्पर्धकनिके नीचे अपूर्व शक्ति लीए नवीन अपूर्व स्पर्धक समय-समय प्रति करिए है ।।४८०।। ऐसें प्रथम अनुभाग कांडकका घात भएं कहा हो है ? सो कहैं हैं पढमाणुभागखंडे पडिदे अणुभागसंतकम्मं तु । लोभादणंतगुणिदं उवरिं पि अणंतगुणिदकमं ॥४८१॥ १. तम्हि चेव पढमसमए जं दिस्सदि पदेसग्गं तमपुव्वफद्दयाणं पढमसमए वग्गणार बहुअं । पुव्वफदयआदिवग्गणाए विसेसहीणं । जहा लोहस्स तहा मायाए माणस्स कोहस्स च ।-क० चु० पृ० ७९३ । विदियसमए अपुव्वफद्दएसु वा पुन्वफद्दएसु वा एक्केक्किस्से वग्गणाए जं दिस्सदि पदेसगं तमपन्वफद्दयआदिवग्गणाए बहुआ। सेसासु अणंतरोपणिधाए सव्वासु विसेसहीणं । -क० चु० पृ० ७९४-७९५ ।। २. तदो से काले अणुभागसंतकम्मे णाणतं । तं जहा-लोभे अणुभागसंतकम्मं थोवं। मायाए अणु Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001606
Book TitleLabdhisar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Shastri
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1980
Total Pages744
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Karma, & Samyaktva
File Size15 MB
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