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________________ लाटीसंहिता ३३ विधाभूतस्य तस्योच्चैरेवं मिथ्यात्वकर्मणः । भेदास्त्रयश्चतुष्कं च स्यादनन्तानुबन्धितः ॥१८ एतत्समुदितं प्रोक्तं दर्शनं मोहसप्तकम् । प्रागुपशमसम्यक्त्वे तत्सप्तोपशमो भवेत् ॥१९ उक्तं चपढमं पढमे णियदं पढमं विदियं च सव्वकालह्मि । खाइयसम्मत्तो पुण जत्थ जिणा केवलं तमि ॥१६ निसर्गेऽधिगमे वापि सम्यक्त्वे तुल्यकारणम् । दृग्मोहसप्तकस्य स्यादुभयाभावसंज्ञकः ॥२० उक्तं च सत्तण्हं उवसमदो उवसमसम्मो खयादुखइयो य । विदियकसाउदयादौ असंजदो होदि सम्मो सो ॥१७ किन्तु सत्यन्तरङ्गऽस्मिन् हेतावुत्पद्यते च यत् । नैसर्गिक हि सम्यक्त्वं विनोद्देशादिहेतुना ॥२१ यत्पुनश्चान्तरङ्गेऽस्मिन् सति हेतौ तथाविधि । उपदेशादिसापेक्षं स्यादधिगमसंज्ञकम् ॥२२ बाह्यं निमित्तमत्रास्ति केषाचिद्विम्बदर्शनम् । अर्हतामितरेषां तु जिनमहिमदर्शनम् ॥२३ इस प्रकार अनादिकालसे चले आए मिथ्यात्वकर्मके तीन भेद हो जाते हैं ॥१८॥ मिथ्यात्वकर्मके ऊपर लिखे तीन भेद तथा अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ चार भेद ये सब मिलकर सात भेद दर्शनमोहसप्तक (सम्यग्दर्शनको ज्ञात करनेवाली सात प्रकृतियाँ) कहलाता है। जब इस जीवको सबसे पहले उपशम सम्यग्दर्शन होता है तब इन सातों प्रकृतियोंका उपशम हो जाता है ॥१९॥ कहा भी है-यह नियम है कि प्रथम अवस्थामें अर्थात् अनादि मिथ्यादृष्टि आत्मामें सबसे पहले प्रथमसम्यक्त्व अर्थात् औपशमिक सम्यग्दर्शन होता है तथा प्रथम औपशमिक सम्यग्दर्शन और द्वितीय क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन समस्त समयमें उत्पन्न हो सकता है। परन्तु क्षायिक सम्यग्दर्शन वहीं होता है जहाँ श्रुतकेवली अथवा भगवान् सर्वज्ञदेव विद्यमान हों ॥१६॥ सम्यग्दर्शन चाहे निसर्गज हो और चाहे अधिगमज हो दोनों प्रकारके सम्यग्दर्शनोंमें सम्यग्दर्शनको घात करनेवाली ऊपर लिखी सातों प्रकृतियोंका अभाव होना समान कारण है। अर्थात् दोनों प्रकारके सम्यग्दर्शनों में इन सात प्रकृतियोंका अभाव होना ही चाहिये विना इन सातों प्रकृतियों के अभाव हुए सम्यग्दर्शन कभी उत्पन्न नहीं हो सकता ॥२०॥ कहा भी है-मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, और सम्यक्प्रकृति मिथ्यात्व ये दर्शनमोहनीयकी तीन प्रकृतियाँ तथा अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ इन सब सातों प्रकृतियोंके उपशम होनेसे औपशमिक सम्यग्दर्शन होता है तथा इन सातों प्रकृतियोंके क्षय होनेसे क्षायिक सम्यग्दर्शन होता है। इस अविरत सम्यग्दर्शन नामके चौथे गण-स्थान में अप्रत्याख्यानावरण कर्मका उद होनेसे संयम नहीं होता इसीलिये इस गुणस्थानको असंयत सम्यग्दर्शन कहते हैं ॥१७॥ सातों प्रकृतियोंके उपशम या क्षय होने पर जो बिना बाह्य कारणोंके सम्यग्दर्शन उत्पन्न हो जाता है उसको नैसर्गिक या निसर्गज सम्यग्दर्शन कहते हैं ।।२१।। तथा जो अन्तरंग कारणोंके होने पर अर्थात् सातों प्रकृतियोंका अभाव होने पर जो उपदेश आदि बाह्य कारणोंको अपेक्षा रखते हुए सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है उसको अधिगमज सम्यग्दर्शन कहते हैं ॥२२॥ इस सम्यग्दर्शनके उत्पन्न होने में बाह्य निमित्तकारण अनेक हैं। किसीको भगवान् अरहन्तदेवके प्रतिबिम्बोंके दर्शन करनेसे सम्यग्दर्शन होता है, किसीको भगवान् अरहन्तदेवकी महिमा या समवशरणादिक विभूतिके देखनेसे सम्यग्दर्शन Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001553
Book TitleSharavkachar Sangraha Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year1998
Total Pages574
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Ethics
File Size14 MB
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