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________________ लाटी संहिता अतिथिसंविभागाख्यं व्रतमस्ति व्रतार्थिनाम् । सर्वव्रतशिरोरत्नमिहामुत्र सुखप्रदम् ॥ २१९ ईषन्न्यूनं च मध्याह्ने कुर्याद् द्वारावलोकनम् । दातुकामः सुपात्राय दानीयाय महात्मने ॥ २२० तत्पात्रं त्रिविधं ज्ञेयं तत्राप्युत्कृष्टमादिमम् । द्वितीयं मध्यमं ज्ञेयं तृतीयं तु जघन्यकम् ॥२२१ उक्तं च उत्कृष्टपात्रमनगारमणुव्रताढ्यं मध्यं व्रतेन रहितं सुदृशं जघन्यम् । निर्दर्शनं व्रतनिकाययुतं कुपात्रं युग्मोज्झितं नरमपात्रमिदं हि विद्धि ॥ ६० एतेष्वन्यतमं प्राप्य दानं देयं यथाविधि । प्रासुकं शुद्धमाहारं विनयेन समन्वितम् ॥ २२२ पात्रालाभे यथाचित्ते पश्चात्तापपरो भवेत् । अधमे विफलं जन्म भूयोभूयश्च चिन्तयेत् ॥ २२३ कुपात्रायाप्यपात्राय दानं देयं यथायथम् । केवलं तत्कृपादानं देयं पात्रधिया न हि ॥ २२४ तरह पका नहीं है जैसे कच्ची रोटी, विना गली हुई दाल या भात, अथवा जो पदार्थ आवश्यकतासे अधिक पक गया जैसे, रोटी जलो, जला हुआ शाक आदि, ऐसे पदार्थोंको दुष्पक्व कहते हैं । ऐसे पदार्थों के सेवन करनेसे लोलुपता अधिक प्रतोत होती है तथा अधपके कच्चे पदार्थ पचते भी नहीं हैं, कठिनतासे पचते हैं अतएव उपभोगपरिभोगपरिमाणव्रत करनेवालों को ऐसे दुष्पक्व पदार्थों का भी त्याग कर देना चाहिए। यदि इस व्रतको पालन करनेवाला ऐसे पदार्थोंका त्याग न करे तो उसके दुष्पक्व नामका पाँचवाँ अतिचार लगता है। इस प्रकार इस व्रतके पांचों अतिचारोंका निरूपण किया । व्रती श्रावकोंको अपना व्रत शुद्ध और निर्दोष रखनेके लिए इन पाँचों अतिचारोंका त्याग कर देना चाहिए। इस प्रकार अतिचार रहित पालन किया हुआ यह उपभोगपरिभोगपरिमाण नामका व्रत गृहस्थोंके लिए अवश्य ही कल्याणकारी होता है ॥२१८॥ व्रत पालन करनेवालोंके लिए अतिथिसंविभागव्रत नामका भी एक उत्तम व्रत है । यह व्रत समस्त व्रतोंके मस्तक का रत्न है तथा इस लोक और परलोक दोनों लोकोंमें सुख देनेवाला है || २१९|| जिस महात्माके लिए, जिस देने योग्य सुपात्रके लिए दान देनेकी इच्छा हो ऐसे श्रावकको दोपहरके कुछ समय पहले द्वारालोकन करना चाहिये ||२२०|| जिनको आहार देना चाहिये ऐसे पात्रोंके तीन भेद हैं पहले उत्तमपात्र, दूसरे मध्यमपात्र और तीसरे जघन्यपात्र ॥२२९॥ १३७ कहा भी है-मुनियों को उत्तम पात्र कहते हैं, अणुव्रती श्रावक मध्यमपात्र हैं, व्रतरहित सम्यग्दृष्टि श्रावक जघन्यपात्र हैं । सम्यग्दर्शनसे रहित और व्रतोंको पालन करनेवाले मिथ्यादृष्टि कुपात्र हैं और जो सम्यग्दर्शनसे भी रहित हैं तथा व्रतोंसे भी रहित हैं ऐसे मनुष्योंको अपात्र कहते हैं ||६०|| उत्तम मध्यम जघन्य इन तीनों पात्रोंमेंसे जो कोई मिल जाय उसीको विधिपूर्वक दान देना चाहिये । दानमें जो आहार दिया जाय वह प्रासुक होना चाहिये और शुद्ध होना चाहिये तथा विनयपूर्वक देना चाहिये || २२२॥ यदि देवयोगसे किसी पात्रका लाभ न हो तो अपने हृदयमें पश्चात्ताप करना चाहिये और इस अधम समय में मेरा जन्म व्यथं जा रहा है इस प्रकार उसे बार बार चिन्तवन करना चाहिये || २२३ || कुपात्र और अपात्रोंको भी उनको योग्यतानुसार दान देना चाहिये, परन्तु इसमें इतना विशेष है कि कुपात्र अपात्रोंको दिया हुआ दान केवल करुणादान कहलाता है तथा करुणाबुद्धिसे ही देना चाहिये । उनको पात्र समझकर या पात्रबुद्धिसे दान कभी १८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001553
Book TitleSharavkachar Sangraha Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year1998
Total Pages574
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Ethics
File Size14 MB
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