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________________ ३७२ श्रावकाचार-संग्रह इति ज्ञात्वा कुपात्रं चापात्रं त्यक्त्वा विधेहि भो । त्रिभेदाय सुपात्राय मित्र ! दानं सुखाकरम् ॥१०८ कुपात्रापात्रयोः स्वामिन् ! लक्षणं कथय स्फुटम् । प्रवक्ष्येऽहं शृणु त्वं भो तयोर्लक्षणमत्र ते ॥ १०९ सम्यक्त्वेन विना यो ना व्रतानि सकलान्यपि । मुनीनां श्रावकाणां च धत्ते भोगादिवाञ्छ्या ॥ ११० तपः करोति घोरं च शास्त्रं पठति प्रत्यहम् । कायक्लेशं विधत्तेऽपि स कुपात्रो मतो जिनैः ॥ १११ इन्द्रियादिषु संसक्तः सम्यक्त्वव्रतवर्जितः । त्यक्तधर्मादिसंवेगः सर्वपापप्रवर्तकः ॥ ११२ देवशास्त्रगुरूणां यो निन्दाकरणतत्परः । गृहकर्मरतोऽपात्रः स प्रोक्तः श्रीजिनाधिपैः ॥११३ तपोवृत्तादिसंयुक्तो मुनिमिथ्यात्वपोषणैः । श्रावको वा कुपात्रस्य पदं प्राप्नोति निश्चितम् ॥ ११४ यः कुपात्राय ना दत्ते सदन्नं पुण्यहेतवे । कुभोगभूषु तिर्यक्त्वं कुनृत्वं वा लभेत सः ॥ ११५ कालोदधौ नृणां यः स्यात्कृनृत्वं लवणार्णवे । लम्बकर्णादिसंयुक्तं कोलविद्युन्मुखादिजम् ॥११६ भोगभूमिषु तिर्यक्त्वं सदीर्घायुः सुखान्वितम् । तत्सवं विबुधैर्ज्ञेयं कुपात्रदानजं फलम् ॥ ११७ तिर्यद्वीपेष्वसंख्येषु नरत्यक्तेषु जायते । पशुत्वं प्राणिनां नूनं कुपात्रादिप्रदानतः ॥ ११८ भोगान्वितं गजत्वं च घोटकत्वं भजन्ति वै । जनाः कुपात्रदानेन राजगेहेषु निश्चितम् ॥ ११९ म्लेच्छाखेटकभिल्लादिकुलेषु जन्मसम्भवम् । लभन्ते नीचपात्रेण धनाढ्येषु शठाः भुवि ॥ १२० लक्ष्मीः कुपात्रदानेन लभ्यते प्राणिभिः स्फुटम् । कुमार्गजातिपापाढ्याः श्वभ्रतिर्यग्गतिप्रदाः ॥ १२१ जाते हैं ॥ १०७॥ यही समझकर हे मित्र ! कुपात्र और अपात्रोंको छोड़कर तीनों प्रकारके पात्रोंके लिये (उत्तम, मध्यम, जघन्य पात्रोंके लिये) सुख देनेवाला दान सदा देते रहना चाहिये || १०८|| प्रश्न – हे स्वामिन् ! कृपाकर कुपात्र और अपात्रोंका लक्षण निरूपण कीजिये । उत्तर - हे वत्स ! चित्त लगाकर सुन, मैं उन दोनोंके लक्षण कहता हूँ ॥ १०९ ॥ जो मनुष्य सम्यग्दृष्टी नहीं हैं किन्तु भोगोंकी इच्छासे मुनि वा श्रावकोंके समस्त व्रत पालन करते हैं तथा घोर तपश्चरण करते हैं, प्रतिदिन शास्त्र पढ़ते हैं और अनेक प्रकारके कायक्लेश करते हैं उनको भगवान् जिनेन्द्रदेव कुपात्र कहते हैं ॥११०-१११॥ जो इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्त हैं, सम्यग्दर्शन और व्रतोंसे रहित हैं, जो धर्म संवेग आदिसे रहित हैं, समस्त पापोंकी प्रवृत्ति करनेवाले हैं, जो देव शास्त्र और गुरुओंकी निन्दा करने में तत्पर हैं और सदा घरके ही कामोंमें लगे रहते हैं उनको भगवान् जिनेन्द्रदेव अपात्र कहते हैं ।११२ - ११३ ॥ जो श्रावक अथवा मुनि तप वा चारित्र आदिसे सुशोभित होकर भी मिध्यात्वकी पुष्टि करता है वह भी कुपात्र के ही पदको प्राप्त होता है इसमें कोई सन्देह नहीं ॥ ११४ ॥ जो मनुष्य पुण्य सम्पादन करनेके लिये कुपात्रोंको श्रेष्ठ अन्न दान देता है वह कुभोगभूमिमें तिर्यंच अथवा कुमनुष्य होता है ॥ ११५ ॥ कालोद समुद्रमें वा लवण समुद्रमें कुभोग भूमियाँ हैं उनमें लम्बकर्ण, लोकमुख, विद्युन्मुख आदि कुमनुष्य होते हैं तथा भोगभूमियोंमें अत्यन्त सुखी और दीर्घ आयुको धारण करनेवाले तिर्यंच होते हैं वे सब कुपात्र दानके फलसे ही होते हैं ऐसा विद्वान् लोगोंको समझ लेना चाहिये ||११६ - ११७ ॥ ढाई द्वीपसे बाहर तिर्यंच लोकके असंख्यात द्वीप समुद्रोंमें जो पशु प्राणी उत्पन्न होते हैं वे सब कुपात्र दानके फलसे ही होते हैं ॥ ११८ ॥ राजघरोंमें जो घोड़े और हाथी बड़े सुखी होते हैं वे कुपात्र दानके ही फलसे होते हैं यह निश्चित है ॥ ११९ ॥ नीच पात्रोंको दान देनेसे ही मूर्ख प्राणी म्लेच्छ, खेटक, भील आदि धनाढ्य कुलोंमें जन्म लेता है || १२०|| कुपात्रोंको दान देनेसे प्राणियोंको जो लक्ष्मी प्राप्त होती है वह कुमार्ग में खर्च होती है, बड़ी पापिनी होती है और नरक तिर्यंच आदि दुर्गतियोंको देनेवाली होती है Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001552
Book TitleShravakachar Sangraha Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year1998
Total Pages534
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Ethics
File Size14 MB
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