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________________ अपभ्रंश में पद के अंत में स्थित ',' '', 'हिं' और 'हं' इनका उच्चारण प्रायः लघु होता है । उदा० (१) अन्नु जु तुच्छउँ तहे धणहे । (देखिये 350/1) उदा० (२) बलिकिाउँ सुअणस्सु । (देखिये 338) उदा० (३) तरुहुँ-वि वक्कलु । (देखिये 341/2) उदा० (४) खग्ग-विसाहिउ जहि लहहुँ । (देखिये 386/1) उदा० (५) तणहँ तइज्जी भंगि न-वि (देखिये 339) 412 म्हो म्भो वा ॥ अपभ्रंशे 'म्ह' इत्यस्य स्थाने 'म्भ' इति मकाराकान्तो भकारो वा भवति । 'म्ह' इति पक्ष्म-श्म-म-स्म-मां म्हः' (८।२।७४) इति प्राकृतलक्षण-विहितोऽत्र गृह्यते । संस्कृने तदसंभवात् । अपभ्रंश में 'म्ह' के स्थान पर 'म्भ' इस प्रकार पूर्व मकारयुक्त भकार विकल्प में होता है। संस्कृत में वह असंभवित होने के कारण 'म्ह' 'पक्ष्म-३म-म-स्म-मां म्हः ।' ( = पक्ष्म, इम, म, स्म और ह्म का म्ह-४/२/७४) ऐसे प्राकृत व्याकरण के अनुसार समजना है | वृत्ति उदा० (१) गिम्भो। सिम्भो । छाया ग्रीष्मः । श्लेष्मा । ग्रीष्म । श्लेष्म । उदा० (२) बम्भ ते विरला के-वि नर जे सम्वंग-छइल्ल । जे वंका ते वंचयर जे उज्जुअ ते बइल्ल ॥ शब्दार्थ बम्भ-ब्रह्मन् । ते-ते । विरला-विरलाः । के-वि-के अपि | नर-नराः। जे-ये । सवंग-छइल्ल (दे.)-सर्वाङ्ग-विदग्धाः । जे-ये । वंका-वक्राः । ते-ते । वचयर-वञ्चकाः । जे-ये । उज्जुअ-ऋजवः । ते-ते । वाल्ल (दे). बलीवदाः । छाया ब्रह्मन्, थे सर्वाङ्ग-बिदग्धाः, ते के अपि नराः विरलाः । ये वक्राः, ते वञ्चकाः । ये ऋजवः ते बलीवर्दाः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001465
Book TitleApbhramsa Vyakarana Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorH C Bhayani
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year1993
Total Pages262
LanguageApbhramsa, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Grammar
File Size12 MB
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