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________________ शब्दार्थ __ उअ (दे.)-पश्य । कणि आरु-कणिकारः । पफुल्लिअउ-प्रफुल्लः । कंचण कंति-पयासु-काञ्चन-कान्ति-प्रकाशः । गोरी-वयण-विणिज्जिअउ-गौरी वदन-विनिर्जितः । नं-ननु । सेवइ-सेवते | वण-वासु-वन-वासम् । छाया कर्णिकारः प्रफुल्लितः काञ्चन-कान्ति-प्रकाशः । गौरी-वदन-विनिर्जितः ननु (अयम्) वन-वासम् सेवते । अनुवाद देखो, कनेर खिली (है वह कैसो) सोनेरी कांति से प्रकाशित हो रही है। मानों गोरी के चेहरे से पराजित हो कर (वह) वनवास का सेवन कर रही है। 397 मोऽनुनासिको वो वा ॥ उदा० छाया 'म' का अनुनासिक 'व', विकल्प में । अपभ्रंशेऽनादौ वर्तमानस्यासंयुक्तस्य मकारस्य अनुनासिको वकागे वा वा भवति । अपभ्रंश में अनाद्य, असंयुक्त मकार का अनुनासिक वकार विकल्प में होता है। कवलु । कमलु ।। भवँरु । भमरु || कमलम् ।। भ्रमरः ॥ कमल । भ्रमर । लाक्षणिकस्यापि । (यहाँ दिये गये) नियमानुसार जो सिद्ध हुआ हो उसका भी । जिव । तिव । जे । तेवँ । यथा । तथा। । यथा । तथा । जैसे । वैसे । जैसे । वैसे । अगदावित्येव । 'मयणु' । असंयुक्तस्येत्येव । 'तसु पर सभलउँ जम्मु' । अनाद्य का ही : 'मयणु' ( = 'मदनः' या 'मदनम्')। असंयुक्त का ही : 'तसु पर सभलउँ जम्म' (देखिये 396/3) वृत्ति उदा० छाया वृत्ति 398 वाऽधो रो लुक् ॥ पिछे का '' विकल्प में लुप्त । अपभ्रंशे संयोगादधो वर्तमानो रेफो लुग् वा भवति । अपभ्रंश में संयुक्त व्यंजनों में परवर्ती रेफ विकल्प में लुप्त होता है। वृत्ति Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001465
Book TitleApbhramsa Vyakarana Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorH C Bhayani
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year1993
Total Pages262
LanguageApbhramsa, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Grammar
File Size12 MB
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