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________________ वृत्ति उदा० (२) भमरा, एत्थु वि लिंबडइ के -वि दि भहडा विलंबु । घण-पत्तलु छाया-बहुलु फुल्लइ जाम कयंबु । शब्दार्थ भमरा-भमर । एत्थु-अत्र । वि-अपि । लिंबडइ-निम्बे । के-वि कानपि । दिअहहा-दिवसान् । बिलंबु-बिलम्बस्व । घण-पत्तलु-धनपत्रवान् । छाया-बहुलु-छाया-बहुलः । फुल्लइ-फुल्लति । जाम-पावत् । कम्बु-कदम्बः । छाया भ्रमर, अत्र निम्बे अपि (तावत् ) कानपि दिवसान विलम्बस्व । यावत् घनपत्रगन् छाया-बहुल: कदम्बः फुल्लति ॥ अनुवाद (हे) भ्रमर, घने पत्तोंवाला ( = सरस), पनी छौहवाला कदंब खिले, तबतक कुछ दिन तो यहाँ नोम पर ठहर ( = निवास कर) । एत् । 'एँ' :उदा० (३) प्रिय एवंहि करे सेल्लु करि छड्ड हे तुहुँ करवालु । जं कावालिय बप्पुडा लेहि अभग्गु कवालु ॥ शब्दार्थ प्रिय-(हे) प्रिय । एवहि-इदानीम् । करे-कुरु । सेल्लु (दे.)-भल्लम् । करि-करे । छड्डहि (दे.)-यज । तुहुँ-त्वम् । करवालु-करवालम् । जंयद् । कावालिय-नागलिका: । वप्पुडा (दे.)--वराकाः । लेहि-गृह्णन्ति । अभागु-अभनम् । कवालु-कपालम् ॥ छाया प्रिय, इदानीम् करे भल्लम् कुरु । त्वम् करवालम् त्यज । यद् वराकाः कापालिकाः अभनम् कपालम् गृह्णन्ति ।। अनुवाद (हे) प्रिय, अब तुम तलवार छोड़ दो (और) हाथ में भाला लो, जिससे बेचारे कापालिकों (को) साबून स्रोग्ड़ी (नो) ले (मिले) । वृत्ति पक्षे (४)-'सुमरहि' इत्यादि । इसके अन्य पक्ष में, ('सुमरि' के बदले) 'सुमाहि' आदि (होता है)। 388 वय॑ति-स्यस्य सः ॥ भविष्यकाल के 'स्य' का 'स०' ।। अपभ्रंशे भविष्यदर्थविषयस्य वादेः सस्य 'सो' वा भवति ।। वृत्ति Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001465
Book TitleApbhramsa Vyakarana Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorH C Bhayani
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year1993
Total Pages262
LanguageApbhramsa, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Grammar
File Size12 MB
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