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________________ २३२ भवणं पेयवणं पिव, रणरणयकरं कुरंगच्छि ॥ २९५३ ॥ अइदुग्गगहगहिओ व्व भीमभूयाभिभूयमुत्ति व्व । जंपेइ एगगो विहु पेच्छइय अबद्धलक्खं सो ॥ २९५४ ॥ इय तेण वल्लहपिया - विओयविदुरेण नयरउव्वेढे । जाए बाहिं पि गवेसिया न वत्ता व से पत्ता ॥ २९५५ ॥ तत्तो एत्तियकालो जाओ पालंतयस्स वालं से । सयणेहिं जंपिएण वि तेण न थी का वि उव्वूढा ।। २९५६ ॥ मुंजी बंधाईया किरिया पुत्तस्स कारिबया पिउणा । इयरो वि कुलायारं न चयइ किं तारसो सगुणी ॥ २९५७ ॥ विज्जागहणावसरे उज्जमिणा पाढिओ सुओ तेण । समयम्मि फलइ किरिया कीरंती नो असमयम्मि ।। २९५८ ।। सिरिअणंतजिणचरियं सो हं संपइ तुह कणयदाणमायन्निऊणमिह पत्तो । ससुओ वि देवि ! तुह पुच्छियं मए सव्वमवि कहीयं ।। २९५९ ।। तं सोउं देवीए वि चिंतियं पेच्छ कह महासत्तो । एसो अईवअसुहट्ठाणं जाओ मह विओगे ॥ २९६० ॥ ता केणावि पओगेण जामि सह वल्लहेण सट्ठाणे । जमभिप्पेयपवित्ती तं चिय नियजीवियव्व फलं ।। २९६१ ॥ इय चिंतिय नियवइयरमसेसमवि कहइ तस्स पइरिक्के | जह रन्ना आणीया अणिच्छमाणी वि अहमेत्थ || २९६२ ॥ भाइ य मए इय धणव्वओ कओ सामि ! तुज्झ मिलणत्थं । धणमज्जिज्जइ मणुयत्थमेत्थ जं तेण तं पत्तो ।। २९६३ ।। तुज्झ पयच्छिस्समहं महंतरयणाणि लक्खलब्भाई । सलहिज्जइ सा लच्छी भोज्जा जा होइ सयणाण || २९६४ ॥ कीए वि मईए मज्झ वि जं तीए समं समाहाणं । चिरविरहियपियाजोगो निवुइहेऊ जममय व्व ॥ २९६५ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001445
Book TitleAnanthnath Jina Chariyam
Original Sutra AuthorNemichandrasuri
AuthorJitendra B Shah, Rupendrakumar Pagariya
PublisherL D Indology Ahmedabad
Publication Year1998
Total Pages778
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, Story, N000, & N001
File Size10 MB
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