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________________ २६ ] पउमकित्तिविरइङ ११ Jain Education International अह अह सत्थवाहि पयडुज्जल मासह चार पत्र किल सम्महि उ सिक्खाव कहिउ पहिल्लउ सहु सामाइएण जग-सेवहॉ .. तं सिक्खावउ बिज्जउ बुच्चइ मुणि- रिसि- संजयाहँ अणयारहँ दारावेक्ख करिवि जो भुंजइ रण-यालि सल्लेहण किज्जइ धम्म-झा अप्पाणु थविज्जइ घत्ता - इउ बारह - भेयँहि धम्मु जो परमत्यें पालइ सो गरु मुणिवरेण दय धम्मु करतें सत्थवाहि वणि णिणि पयतें भति करिज्जहि जिणवर-णाहहों भति तासु पसरिज्जइ सुरवर भत्तिएँ उ देउ घरे आवर भत्ति करंतु जिनिंदहों अणुदिणु भत्तिएँ देव-लोउ पाविज्ज‍ भत्तिएँ जहाँ जाणु जाणिज्जइ सावय- लोयहॉ अक्खउ । होइ ण दुक्खिउ || ११ ॥ १२ सुणि सिक्खावय कहमि सुणिम्मल । ते सावय-भावें उवासहि । पाउ होइ जें जीवों ढिल्लउ । जं आराहण किज्जर देवहाँ । जे संसार-समुद्दों मुंबई | अज्जिय- सावयाहँ वयधारहँ । सिक्खावर तसुं तिज्जउ जुंज्जइ । संथारइ तव चरणु लइज्जइ । पंच-पये णवयारु सरिज्जइ । पुणु वि पेबॉल्लिड सुद्धचरितें । क.मि किं पि लइ भाविवि चित्तें । धवलं- विमल - केवल-गुण-वाहहों । सिज्झइ विज्ज मंतु महभयवइ । भत्तिएँ पाडिहेर रु पावइ । करइ पसंस सलु तहाँ भवियणु । अप्पर णरय पडंतु धरिज्जइ । भत्तिए सन् किंपि पाविज्जइ । घत्ता - संतुट्टिउ भाउ णिरंतरु चलण जिगहों जो संभरइ । सो संजम - नियम - विसणु देव - विमाहि संचरइ ॥ १२ ॥ [३, ११, १ (११) १ ख- सत्थाहिव महि प । २ क- हे । ३ क उप्पोसहे । ४ ख ए । ५ ख जं । ६ ख हैं । ७ख'गि । ८ ख- 'रे' । ९ ख - हु । १० ख- भुं । ११ ख- प्रति के पत्र क्रमांक पन्द्रह तथा सोलह गुमे हुए हैं अतः यहां से लेकर चौथी संधि के तीसरे कडवक की पाचवीं पंक्ति तक का पाठ केवल क प्रति के आधार पर संशोधित किया गया है। १२ क'३ | १३ क है | (१२) १ क- 'ब्वोलि' । २ क- 'हे । ३ क है । For Private Personal Use Only 5 10 5 10 www.jainelibrary.org
SR No.001444
Book TitlePasanahchariyam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmkirti
PublisherPrakrit Text Society Ahmedabad
Publication Year1965
Total Pages538
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size12 MB
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