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________________ प्रस्तावना 65 कोई एकका वेदन करता है, कोई दो का और कोई अधिक-से-अधिक इतने का वेदन करता है। वहाँ तो एक मात्र यही बतलाया गया है कि जो सात या आठ कर्मोका बन्ध करते हैं उनके सब परीषह सम्भव हैं, परन्तु वे एक साथ वेदन मात्र बीसका करते हैं। जो छह कर्मका बन्ध करते हैं उनके चौदह परीषह सम्भव हैं परन्तु वे एक साथ वेदन मात्र बारहका करते हैं। जो वीतराग छमस्थ एक कर्मका बन्ध करते हैं उनके भी चौदह परीषह सम्भव हैं परन्तु वे एक साथ वेदन मात्र बारहका ही करते हैं। जो एक कर्मका बन्ध करनेवाले सयोगी जिन हैं उनके परीषह तो ग्यारह सम्भव हैं, परन्तु वे एक साथ वेदन मात्र नौ का करते हैं। तथा जो अबन्धक अयोगी जिन हैं उनके भी परीषह तो सयोगी जिनके समान ग्यारह ही सम्भव हैं परन्तु वे एक साथ वेदन मात्र नौ का करते हैं। __इसलिए यहाँ भी तत्त्वार्थसूत्र और श्वेताम्बर आगम साहित्यके तुलनात्मक अध्ययनसे हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि 'एकादश जिने' सूत्रका विधान करते हुए भी तत्त्वार्थसूत्रकार जितने अधिक दिगम्बर परम्पराके नजदीक हैं उतने श्वेताम्बर परम्पराके नजदीक नहीं हैं। यह है तत्त्वार्थसूत्रके कुछ सूत्रोंका परीक्षण जिससे भी हमें इस बातके निर्णय करने में सहायता मिलती है कि तत्त्वार्थसूत्रकार वाचक उमास्वातिसे भिन्न होने चाहिए। किन्तु दिगम्बर परम्परामें उमास्वाति या उमास्वामी नामके कोई आचार्य हुए हैं इस बातका सूचक कोई प्राचीन उल्लेख नहीं मिलता। श्रवणबेलगोलाके शिलालेख या दूसरे जितने भी प्रमाण मिलते हैं वे सब उन उल्लेखोंसे जो तत्त्वार्थसूत्रको आचार्य गृद्धपिच्छकी कृति प्रकट करते हैं, बादके हैं, अतएव एक तो इस मामले में उनका उतना विश्वास नहीं किया जा सकता। दूसरे उन में उपपदके रूप में या नामके रूपमें गदपिच्छ इस नामको भी स्वीकार कर लिया गया है। सिरसेनीय टीका-पं० सुखलालजीने अपने तत्त्वार्थसूत्र की प्रस्तावनामें सिद्धसेन गणि और हरिभद्रसूरिकी टीकासे एक-दो उल्लेख उपस्थित कर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि तत्त्वार्थसूत्रकार और उनके भाष्यकार एक ही व्यक्ति हैं, किन्तु वे उल्लेख सन्देहास्पद हैं । उदाहरणार्थ सिद्धसेन गणिकी टीकामें सातवें अध्यायके अन्त में जो पुष्पिका उपलब्ध होती है उसमें आये हुए 'उमास्वातिवाचकोपासत्रभाध्ये पदको पण्डितजी भाष्यकार और सूत्रकार एक व्यक्ति हैं इस पक्षमें लगाने का प्रयत्न करते हैं किन्तु इस पदका सीधा अर्थ है-उमास्वाति वाचक द्वारा बनाया हुआ सूत्रभाष्य । यहाँ उमास्वातिवाचकोपज्ञ पदका सम्बन्ध सूत्रसे न होकर उसके भाष्यसे है। दूसरा प्रमाण पण्डितजीने 9वें अध्यायके 22वें सूत्रकी सिद्धसेनीय टीकाको उपस्थित किया है। किन्तु यह प्रमाण भी सन्देहास्पद है, क्योंकि सिद्धसेन गणिकी टीकाकी जो प्राचीन प्रतियाँ उपलब्ध होती हैं उनमें 'स्वकृतसूत्रसन्निवेशमाश्रित्योक्तम्' पाठके स्थान में 'कृतस्तत्र सूत्रसन्निवेशमाभित्योक्तम' पाठ भी उपलब्ध होता है। बहुत सम्भव है कि किसी लिपिकारने तत्त्वार्थसूत्रका वाचक उमास्वाति कतत्व दिखलाने के अभिप्रायसे 'कृतस्तत्र'का संशोधन कर 'स्वकृत' पाठ बनाया हो और बाद में यह पाठ पल पड़ा हो। साधारणतः हमने स्वतन्त्र भावसे सिद्धसेन गणिकी टीकाका आलोडन किया है, इसलिए इस आधारसे हम यह तो मान लेते हैं कि उसमें कुछ ऐसे भी उल्लेख मिलते हैं जो सिद्धसेन गणिकी दृष्टि में तत्त्वार्थसूत्र और तत्त्वार्थभाष्य इनको एककर्तृक सिद्ध करते हैं। उन मेंसे प्रथम उल्लेख प्रथम अध्यायके 'आचे परोक्षम' सूत्रकी सिद्धसेनीय टीका है। यहाँ पर सिद्धसेन गणि तत्त्वार्थभाष्य के सूत्रक्रमप्रामाण्यात् पयमद्वितीये शास्ति' अंशकी व्याख्या करते हुए कहते हैं 1. व्याख्याप्रज्ञप्ति श० 8। 2. देखो उनके तत्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना पृष्ठ 17 की टिप्पणी 1 । 3. देखो सिद्धसेनीय टीका अ०9, सू० 22, पृ० 253 की टिप्पणी । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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