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________________ सर्वार्थसिद्धि मिथ्यादृष्टि गुण-स्थान का निर्देश किया गया है। उक्त तुलनासे स्पष्ट है कि सर्वार्थसिद्धिकारने भी एकमात्र इसी सम्प्रदायका अनुसरण किया है। जीवस्थान संख्या-प्ररूपणा सर्वार्थसिद्धि संख्या-प्ररूपणा ओघेण मिच्छाइट्टी दव्वपमाणेण केवडिया। सामान्येन तावत् जीवा मिथ्यादृष्टयोऽअणंता।। 2 ।। सासणसम्माइट्रिप्पहुडि जाव संजदा- नन्तानन्ताः । सासादनसम्यग्दृष्टयः सम्यमिथ्यादृष्टसंजदा त्ति दव्वपमाणेण केवडिया। पलिदोवमस्स | योऽसंयतसम्यग्दृष्टयः संयतासंयताश्चपल्योपमासंख्येयअसंखेज्जदिभागो।......॥6॥ पमत्तसंजदा दव्व- | भागप्रमिताः। प्रमत्तसंयताः कोटीपृथक्त्वसंख्या:।... पमाणेण केवडिया। कोडिपुधत्तं ॥7॥ अप्पमत्त- | अप्रमत्तसंयताः संख्येया: । चत्वार उपशमका: प्रवेशेन संजदा दव्वपमाणेण केवडिया । संखेज्जा ।।8।एको वा द्वौ वा त्रयो वा । उत्कर्षेण चतुःपञ्चाशत् । चदुण्हमुवस.मगा दव्वपमाणेण केवडिया। पवेमेण | स्वकालेन समुदिता: संख्येयाः । चत्वारःक्षपका अयोगिएक्को वा दो तिण्णि वा, उक्कसेण चउवण्णं ॥9॥ केवलिनश्च प्रवेशेन एको वा दो वा. त्रयो वा । उत्कर्षेअखं पडुच्च संखेज्जा॥10॥ चउण्डं खवा अजोगि- णाष्टोत्तरशतसंख्याः। स्वकालेन समुदिता: संख्येयाः । केवली दव्वपमाणेण केवडिया। पवेसेण एक्को वा दो | पण देवरिया। पवेमेण एकको वा दो | सयोगकेवलिनः प्रवेशेन एको वा द्वौ वा त्रयो वा। वा तिण्णि वा, उक्कस्सेण अट्टोत्तरसदं ।11।। अद्धं | उत्कर्षणाष्टोत्तरशतसंख्या: । स्वकालेन समुदिताः पडच्च संखेज्जा ।। 12॥ सजोगिकेवली दव्वपमाणेण | शतसहस्रपृथक्त्वसंख्या: । केवडिया। पवेसेण एकको वा दो वा तिण्णि वा, उक्कस्सेण अठुत्तरसयं ॥ 13 ।। अद्धं पडुच्च सदसहस्सपुधत्तं ।। 14॥ यहाँ हमने जीवस्थानके सत् और संख्या प्ररूपणाके कुछ सूत्रोंकी तुलना दी है । सब प्ररूपणाओंकी यह तुनना बिम्बप्रतिबिम्बभावको लिये हुए है। स्पष्ट है कि सर्वार्थ सिद्धिकारने 'सरसंख्या-' इत्यादि सूत्रकी प्ररूपणा जीवस्थानके आठ अनुयोगद्वारोंको सामने रख कर की है। सर्वार्थसिद्धि लिखते समय पूज्यपाद स्वामीके सामने केवल जीवस्थान ही उपस्थित नहीं था किन्तु जीवस्थानकी चूलिका व दूसरे खण्ड भी उनके सामने रहे हैं। इसके लिए तत्त्वार्थसूत्रके प्रथम अध्यायके 'निर्वेशस्वामित्व-' इत्यादि सूत्रकी सर्वार्थसिद्धि टीका देखिए। इसमें सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके कारणोंका निर्देश जीवस्थान चूलिका अनुयोगद्वारके आधारसे किया है । तथा उपशम आदि सम्यक्त्वोंके कालका निर्देश क्षुल्लकबन्धके आधारसे किया है। आ० कुन्दकुन्दका साहित्य-जैनपरम्परामें श्रुतधर आचार्यों में समयप्रभावक जितने आचार्य हुए हैं उनमें आचार्य कून्दकुन्दका नाम प्रमुखरूपसे लिया जाता है। कुछ तथ्योंके आधारपर कहा जाता है कि इन्हें विदेह क्षेत्र में स्थित सीमन्धर तीर्थकरके साक्षात् दर्शन और उपदेश श्रवणका लाभ मिला था और इन्हें चारणऋद्धि प्राप्त थी। इन्होंने परम्परानुसार मोक्षमार्गके अनुरूप जैनतत्त्वज्ञानकी स्पष्ट दिशाका प्रतिपादन कर समग्र जैनपरम्पराको प्रभावित किया है। जैनतत्त्वज्ञान व्यक्तिस्वातन्त्र्यका समर्थक है और उसकी प्राप्तिका एकमात्र मार्ग स्वावलम्बन है। इस तथ्य को संस। रके सामने जितने सुन्दर शब्दों में इन्होंने रखा है उसकी तुलना अन्य किसीसे नहीं की जा सकती है। वे जैनपरम्परा में ऐसे प्रकाशमान् सूर्य थे जिनसे दसों दिशाएँ आलोकित हुई हैं । बोधप्राभूतमें एक माथा आयी है। जिस में इन्होंने अपनेको श्रुतकेवली भद्रबाहुका गमक शिष्य घोषित किया है । सायप्राभृतका प्रारम्भ करते हुए वे कहते हैं कि 'मैं श्रुतकेवलीके द्वारा कहे गए समयप्राभूतका कथन करता हूँ।' उनके ये वचन आकस्मिक नहीं हो सकते । बहुत सम्भव है कि उन्हें भद्रबाहु श्रुतकेवलीके तत्त्वज्ञान का सीधा या परम्परा लाभ मिला हो; क्योंकि इनके द्वारा निर्मित साहित्य में जो विशेषता है वह आकस्मिक नहीं हो सकती। वस्त्र-पात्रके स्वीकार की चर्चाने जैनपरम्पराके तत्त्वज्ञानको बहुत अधिक धूमिल किया है। 1. 'बारहअंगवियाणी चउदसपुग्वंगविउलवक्छरणं । सुयणाणि भद्दबाहू गमयगुरू भयवओ जयउ॥' Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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