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________________ 44 सर्वार्थसिद्धि आचार्यने भी समयप्राभूतकी टीका में। समयप्राभृतको अर्हत्प्रवचनका अवयव कहा है। इन दोनों स्थलों पर साधारणत: अहंद्वचन या अर्हत्प्रवचनसे द्वादशांगका बोध होता है। किन्तु जब भट्ट अकलंक देव अर्हत्प्रवचनहृदय या अर्हत्प्रवचन नामके स्वतन्त्र ग्रन्थका उल्लेख करते हैं, इतना ही नहीं वे उसके एक वचनको उद्धृत भी करते हैं जो तत्त्वार्थसूत्र के सूत्रसे बिलकुल मिलता जुलता है तब यह प्रश्न अवश्य होता है कि क्या ऐसा कोई महान् ग्रन्थ रहा है जिसमें समग्र जैनसिद्धान्तका रहस्य अन्तनिहित था और जिसका उल्लेख करना सबके लिए अनिवार्य था। जो कुछ भी हो एक बात स्पष्ट है कि तत्त्वार्थवातिककारके सामने तत्त्वार्थकी उपलब्ध टीकाओंके अतिरिक्त कोई अन्य वृत्ति अवश्य रही है जो सर्वार्थसिद्धि और तत्वार्थभाष्यसे भिन्न थी और बहुत सम्भव है कि उसी वृत्तिका उल्लेख उन्होंने तत्त्वार्थवार्तिक में किया है। इसी प्रसंगो हमने सिद्धसेनगणिकी टीकाका भी आलोडन किया है। इस सम्बन्ध में हम पहले ही कह आये हैं कि सिद्धसेन गणिकी टीका अनेक सूत्र विषयक मत-मतान्तरों और उल्लेखोंको लिये हुए है। उसका बारीकीसे पर्यालोचन करनेपर यह भी विदित होता है कि उसके सामने न केवल सर्वार्थसिद्धि, तत्त्वार्थभाष्य और तत्त्वार्थवार्तिक थे, अपितु तत्त्वार्थसूत्रपर लिखी गयी नयी पुरानी और भी अनेक टीकाएं उनके सामने रही हैं। यह अनुमान प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीका भी है जिसका निर्देश हम पहले कर आये हैं। सर्वार्थसिद्धि, तत्त्वार्थवातिक और सिद्धसेनगणिकी टीकाके ये वे उल्लेख हैं जिनसे हमें तत्त्वार्थसूत्र विषयक अन्य अनेक छोटी-बड़ी टीकाओं के अस्तित्वका आभास मिलता है। तत्काल विचारणीय यह है कि ये.सब टीका ग्रन्थ किस आधारसे लिखे गये होंगे। सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थवार्तिक में जिनका उल्लेख है वे तो स्वतन्त्र होंगे यह स्पष्ट ही है। मात्र विचार उनका करना है जिनका उल्लेख सिद्धसेनगणिने किया है । यह तो हम स्पष्ट देखते हैं कि तत्त्वार्थभाष्यके कारण भाष्यानुसारी सूत्रपाठका स्वरूप और अर्थ एक तरहसे सुनिश्चित है। जो लिपिकारोंकी असावधानीसे थोड़े बहुत दोष उत्पन्न होते हैं वे तत्त्वार्थभाष्य में भी देखे जाते हैं। किन्तु इन दोषोंके कारण तत्त्वार्थभाष्य समस्त सूत्रपाठ में तत्त्वार्थभाष्यकी उपस्थिति में पाठान्तर या अन्तिरकी कल्पना करना सम्भव नहीं है। ऐसी अवस्था में इन टीका ग्रन्थोंको भी सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थवार्तिकमें उल्लिखित टीका ग्रन्थों के समान स्वतन्त्र ही मानना पड़ता है। सिद्धसेनगणिने मतभेदोंको दरसाते हुए अन्य मतोंका जिस रूप में उल्लेख किया है उससे भी तथ्यकी पुष्टि होती है। ये सब टीकाग्रन्थ कब और किन आचार्योंकी कृति हैं यह तो हम निश्चयपूर्वक नहीं कह सकते हैं। बहुत सम्भव है कि वे सब या उन मेंसे कुछ तत्त्वार्थभाष्यके भी पहले लिखे गये हों और उनके लेखक श्वेताम्बर आचार्य रहे हों। यदि यह अनुमान है, जिसके कि सही होनेकी अधिक सम्भावना है, तो यही कहना पड़ता है कि तत्त्वार्थभाष्य उस कालकी रना है जबकि मूल तत्त्वार्थसूत्रपर अनेक टीका टिप्पणियाँ प्रचलित हो चुकी थीं और जिन मेंसे एक सर्वार्थसिड भी है। 2. सूत्रोल्लेख-साधारणतः किसी विषयको स्पष्ट करने, उसकी सूचना देने या अगले सूत्रकी उरगनिका बांधनेके लिए टीकाकार आगेके या पीछेके सूत्रका उल्लेख करते हैं। यह परिपाटी सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यमें भी विस्तारपूर्वक अपनायी गयी है। किन्तु आगेके या पीछेके सूत्र का उल्लेख करते समय इन टीका ग्रन्थों में उन्हीं सूत्रपाठोंका उल्लेख किया जाता है जो उन्हें सम्मत होते हैं । उदाहरणार्थसर्वार्थसिद्धिकारने अध्याय एकके इक्कीस नम्बरका सूत्र ‘भवप्रत्ययोऽवधिदेवनारकाणाम्' इस रूपमें स्वीकार किया है, अतएव वे चौथे अध्यायके प्रथम सूत्रकी उत्थानिका लिखते समय इस सूत्र का इसी रूप में उल्लेख करते हैं। इसी प्रकार तत्त्वार्थभाष्यकारने इस सूत्रको 'भवप्रत्ययोऽवधिनारकवेवानाम्' इस रूप में स्वीकार 1. 'प्राभृताह्वयस्याहत्प्रवचनावयवस्य' गा. 1. टीका। 2. देखो अध्याय 6 सूत्र 3 व 4 का तत्त्वार्थभाष्य । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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