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________________ परिशिष्ट 2 [417 होते हैं उनकी आयुका विषादिके द्वारा घात होता . 399 है। कहा है-विष, वेदना, रक्तक्षय, भय, शस्त्रघात, 161.10 जलतलाज्जलोपरितनभागात् तावबहुलसंक्लेश, तथा आहार और श्वासोछ्वासके रुकनेसे पत्रप्रचयं क्रोशद्वयस्थौल्योपेतपत्रप्रचयम् । आयु छिद जाती है। इति द्वितीयोऽध्यायः। द्विर्धातकी ...॥33॥ ६. 430 169.13 टंकच्छिन्नतीर्थः टंकछिन्नतटः । भरत ... 137॥ तामु त्रिंश ... 120 8.437 ६. 369 173.8 नन्वशुभकर्मणः सप्तमनरकप्रापणस्य 152.7 इतरो विशेषो नरकप्रस्ताराणां रचना न भरतादिष्वेवानमित्याद्य क्तं, स्वयंभरमणजलधिजप्रमाणादिलक्षणो लोकनयोगतः लोकानुयोगनाम्न भरतादिष्वेवानमित्याद्य क्तं , मत्स्यानां सप्तमनरकप्रापकाशुभकर्मारम्भकत्वाआगमविशेषात् । भावप्रसंगात् । तदयुक्तं तत्परभागस्य कर्मभूमित्वात् । परम्परो...॥4॥ तथाहि-स्वयंभूरमणद्वीपमध्ये तद्द्वीपार्धकारी मान षोत्तराकारः स्वयंप्रभनगवरो नाम नगो व्यवस्थित8.372 स्तस्यार्वाग्भाग आमानुषोत्तराद् भोगभूमिभागः ।। 154.7 भिण्डिमवालो-गोफणा। तत्र चतुर्गणस्थानवर्तिनस्तिर्यञ्चः सन्ति । ततः परतः आलोकान्तात् कर्मभूमिभागः। तत्र पञ्चमुणस्थानसंक्लिष्टा...॥5॥ वर्तिनः प्रकृष्टशुभाशुभकर्मारम्भकास्ते सन्तीति कर्म8.375 भूमित्वम् । कथमन्यथा तत्र पूर्वकोट्यायुरर्वाग्माये चासंख्येयवर्षायुरिति । मनुष्यक्षेत्रप्रधानतयाभिधा155.6 कुटशाल्मलिः कृत्रिमशाल्मलिः। अम्बरीषो नाद्वा न दोषः । भ्राष्ट्रः। शिंका-सातवें नरकमें ले जानेवाले अशुभकर्मका तद्विभाजिनः ...॥11॥ उपार्जन भरत आदिमें ही होता है यह कथन मिथ्या. 8. 387 होनेसे अयुक्त है । क्योंकि ऐसा कहनेसे स्वयम्भूरमण 159.9 क्षुद्रहिमवान् लघुहिमवान् । हरिवर्षस्य समुद्र में वर्तमान महामत्स्यके सातवें नरकमें ले जानेहरिक्षेत्रस्य। वाले अशुभ कर्मके उपार्जन के अभावका प्रसंग आता हेमार्जुन " ॥12॥ ६. 389 160.2 चीनपट्ट-शुभ्रपट्टोलकम् । पद्य .."11411 उत्तर-ऐसा कहना अनुचित है, क्योंकि स्वयंभरमणका पर भाग कर्मभूमि है । इसका खुलासा इस प्रकार है-स्वयंभूरमण द्वीपके मध्यमें उस द्वीपको दो भागों में विभाजित करनेवाला, मनुषोत्तर पर्वतके आकार स्वयंप्रभ नामक पर्वत स्थित है। उसके पूर्वभागमें मानुषोत्तर पर्यन्त भोगभूमि है। वहाँ चारगुणस्थानवाले तियंच रहते हैं। स्वयंप्रभ पर्वतसे आगेवाले भागमें लोकान्त तक कर्मभूमि है। वहां पांच गुणस्थानवाले प्रकृष्ट शुभ और अशुभ ६. 395 161.2 प्राक् पूर्वः । प्रत्यक पश्चिमः । उदक् उत्तरः। अवाक् दक्षिणः। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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