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________________ 410] सर्वार्थसिद्धि ६. 129 (कुछ कम) पूर्वकोटि काल तक रहता है पुनः उपशम- बहुत है।] श्रेणिपर आरोहण करता है। इस तरह देशान पूर्व ६. 125 कोटि अन्तर होता है।] 57. 10 शुक्ललेश्येष्वप्रमत्तादीनामुपशमश्रेण्यारोह६. 121 णाभिमुख्यारोहणसद्भावाभ्यां लेश्यान्तरपरावर्ताभा वादेकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः। उप55.5 सामायिकछेदोपस्थापनशुद्धिसंयतेषु द्वयोरुप- शान्तकषायस्य पतितस्य प्रमत्ते लेश्यान्तरं संस्पृश्य शमकयोरेकजीवं प्रत्युत्कर्षेण पूर्वकोटी अष्टवर्षानन्तरं श्रेण्यारोहणादेकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । तपो गृहीत्वोपशमश्रेणिमारुह्य पतितः प्रमत्ताप्रमत्तयोः [शुक्ललेश्या में अप्रमत्तसंयत आदिका एक जीवके पूर्वकोटिकालशेषं यावद् वर्तित्वा पूनस्तदारोहणं करो प्रति जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहर्त है क्योंतीति देशोना। सूक्ष्मसांपरायसंयमे उपशमकस्यैक कि शुक्ललेश्यावाला कोई एक अप्रमत्तसंयत उपशम जीवं प्रति नास्त्यन्तरं गुणान्तरे तत्संयमाभावात् । श्रेणिपर चढ़कर अन्तरको प्राप्त हुआ और सर्वजघन्यअसंयमेषु मिथ्यादृष्ट्यैकजीवं प्रत्युत्कर्षेण नरके सप्तम कालमें लौटकर अप्रमत्त संयत हुआ। इसी प्रकार पृथिव्यामुत्पद्यतेऽन्तर्मुहुर्ते गते सम्यक्त्वं प्रतिपद्यते उत्कृष्ट अन्तर भी होता है, इस कालमें लेश्या परिमुहूर्तशेषे त्यजतीति देशोनानि। वर्तन नहीं होता। शुक्ललेश्यावाले उपशान्त कषाय[सामयिक दोपस्थापना संयमियों में दो उपशमकों- का जीवके प्रति अन्तर नहीं है क्योंकि उपशान्तका एक जीवके प्रति उत्कर्षसे कुछ कम पूर्वकोटि कषायसे गिरकर छठे गुणस्थानमें लेश्या परिवर्तन अन्तर है क्योंकि पूर्वकोटिकी आयुवाला मनुष्य आठ- - होकर ही श्रेणिपर आरोहण होता है। वर्षके पश्चात् संयमको ग्रहण करके उपशम श्रेणिपर आरोहण करके गिरा और प्रमत्त-अप्रमत्त गुणस्थानोंमें 3. पूर्वकोटिकालके शेष होने तक रहकर पुनः उपशम- 58. 10 औपशमिकासंयतसम्यग्दृष्टीनां सान्तरत्वाश्रेणिपर आरोहण करता है इस तरह देशोन होता नानाजीवापेक्षया सप्तरात्रिदिनानि । औपशमिकहै। सक्षमसाम्पराय संयममें एक जीवके प्रति उप- सम्यक्त्वं हि यदि कश्चिदपि न गलति तदा सप्तशमकका अन्तर नहीं है क्योंकि सूक्ष्मसाम्पराय संयम रात्रिदिनान्येव । संयतासंयतस्य चतुर्दश, प्रमत्ता. दसवें गणस्थान में ही होता है। असंयमियों में मिथ्या- प्रमत्तयोः पञ्चदश एकजीवं प्रति जघन्येन जघन्य दष्टि एक जीवके प्रति उत्कर्षसे कुछ कम तेतीससागर उत्कर्षेण चोत्कृष्टोऽन्तर्मुहर्तः । तदुक्तम्--- अन्तर है क्योंकि एक मिथ्यादृष्टि जीव सातवीं सम्मत्ते. सत्तदिणा विरदाविरवेस चोइसा होति । थिवीमें उत्पन्न होता है। अन्तर्मुहूर्त बीतनेपर सम्यक्त्व को ग्रहण करता है । अन्तर्मुहुर्त प्रमाण आयु शेष विरदेसु य पण्णरसा विरहणकालो य बोधव्यो ।। रहनेपर सम्यक्त्वको छोड़कर मिथ्यात्वमें आ जाता [प्रा०५० सं० 205] है। इस प्रकार देशोन तेतीससागर अन्तर होता है।] उपशान्तकषायकजीवं प्रति नास्त्यन्तरं वेदकपूर्वकोप शमिकेन हि श्रेण्यारोहणभाग् भवति, तस्याः पतितो 8. 124 न तेनैव श्रेण्यारोहणं करोति, सम्यक्त्वान्तरं मिथ्यात्वं 57.1 तेज:पद्मलेश्यसंयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयता- वा गत्वा पश्चात्तदादाय करोतीति । अतो नास्ति नामेकजीवापेक्षयापि नास्त्यन्तरमन्तर्मुहूर्त परावर्त- तस्यान्तरम् । सामानसम्यग्मिथ्यात्व-मिथ्यात्व. मानलेश्यत्वात् । युक्तैकजीवं प्रति नास्त्यन्तरं गुणे गुणान्तरविरोधतः सासादनादिगणे स्थितस्य मिथ्यात्वादिनान्तरासंतेजोलेश्या और पद्मलेश्यावाले संयतासंयत, प्रमत्त-- भवात्। संयत, और अप्रमत्तसंयतोंका एक जीवकी अपेक्षासे भी अन्तर नहीं हैं क्योंकि अन्तर्मुहुर्तमें लेश्या बदल [औपशमिक असंयतसम्यग्दृष्टियोंके सान्तरं होनेसे जाती है (और लेश्याके कालसे गुणस्थानका काल नाना जीवोंकी अपेक्षा सात रातदिन अन्तरकाल है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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