SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 488
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 3681 सर्वार्थसिद्धौ [912 8 922--- रायक्षपकगुणस्थानमधिरुह्य तत्र कषायाष्टकं नष्ट कृत्वा नपुंसकवेदनाशं समापाद्य स्त्रीवेदमुन्मूल्य नोकषायषटकं पुंवेदे प्रक्षिप्य क्षपयित्वा पुंवेदं क्रोधसंज्वलने, क्रोधसंज्वलनं मानसंज्वलने, मानसंज्वलनं मायासंज्वलने, मायासंज्वलनं च लोभसंज्वलने क्रमेण बादरकृष्टिविभागेन विलयमुपनीय लोभसंज्वलनं तनूकृत्य सूक्ष्मसांपरायक्षपकत्वमनुभूय निरवशेष मोहनीयं निर्मूलकषायं कषित्वा क्षीणकषायतामधिरुह्यावतारितमोहनीयभार उपान्त्यप्रथमे समये निद्राप्रचले प्रलयमुपनीय पञ्चानां ज्ञानावरणानां चतुर्णा दर्शनावरणानां पञ्चानामन्तरायाणां चान्तमन्ते समुपनीय' तदनन्तरं ज्ञानदर्शनस्वभावं केवलपर्यायमप्रतर्यविभूतिविशेषमवाप्नोति । 8922. आह कस्माद्धेतोर्मोक्षः किलक्षणश्चेत्यत्रोच्यते - बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः ॥2॥ 8923. मिथ्यादर्शनादिहेत्वभावादभिनवकर्माभावः पूर्वोदितनिर्जराहेतुसंनिधाने चाजितकर्मनिरासः । ताभ्यां बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यामिति हेतुलक्षणविभक्तिनिर्देशः । ततो भवस्थितिहेतुसमीकृतशेषकर्भावस्थस्य युगपदात्यन्तिकः कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः प्रत्येतव्यः । कर्माभावो द्विविधः--यत्नसाध्योऽयत्नसाध्यश्चेति । तत्र चरमदेहस्य नारकतिर्यग्देवायुणमभावो न यत्नसाध्यः, असत्त्वात् । यत्नसाध्य इत ऊर्ध्वमुच्यते--असंयतसम्यादृष्ट्यादिषु चतुर्पु गुणस्थानेषु कस्मिश्चि साम्पराय क्षपकगुणस्थानपर आरोहण करके तथा वहाँ आठ कषायोंका नाश करके तथा नपुसकवेद और स्त्रीवेदका क्रमसे नाश करके, छह नोकषायका पूरुषवेद में संक्रमण द्वारा नाश करके तथा पुरुषवेदका क्रोधसंज्वलनमें, क्रोधसंज्वलनका मानसंज्वलनमें, मानसंज्वलनका मायासंज्वलनमें और मायासंज्वलनका लोभसंज्वलनमें क्रमसे बादरकृष्टिविभागके द्वारा संक्रमण करके तथा लोभसंज्वलनको कृश करके, सूक्ष्मसाम्पराय क्षपकत्वका अनुभव करके, समस्त मोहनीयका निमल नाश करके, क्षीणकषाय गुणस्थानपर आरोहण करके, मोहनीयके भारको उतारकर क्षीणकषाय गणस्थानके उपान्त्य संमयमें निद्रा और प्रचलाका नाश करके तथा अन्तिम समय में पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय कर्मोका अन्त करके तदनन्तर ज्ञानदर्शनस्वभाव अवितर्य विभूति विशेषरूप केवलपर्यायको प्राप्त होता है। 8922. कहते हैं कि किस कारणसे मोक्ष प्राप्त होता है और उसका लक्षण क्या है यह बतलानेके लिए आगे का सूत्र कहते हैं बन्ध-हेतुओंके अभाव और निर्जर।से सब कर्मोंका आत्यन्तिक क्षय होना ही मोक्ष है ।।2।। ६ 923 मिथ्यादर्शनादिक हेतुओंका अभाव होनेसे नूतन कर्मोका अभाव होता है और पहले कही गयी निर्जरारूप हेतुके मिलनेपर अजित कर्मोका नाश होता है। इन दोनोंसे, 'बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्याम्' यह हेतुपरक विभक्तिका निर्देश है, जिसने भवस्थितिके हेतुभूत आयुकर्मके बराबर शेष कर्मोकी अवस्थाको कर लिया है उसके उक्त कारणोंसे एक साथ समस्त कर्मोका आत्यन्तिक वियोग होना मोक्ष है ऐसा जानना चाहिए। कर्मका अभाव दो प्रकारका है-यत्नसाध्य और अयत्नसाध्य । इनमें-से चरम देहवालेके नरकायु, तिर्यंचायु और देवायुका अभाव यत्नसाध्य नहीं होता, क्योंकि चरम देहवाले के उनका सत्व नहीं उपलब्ध होता। आगे यत्न-साध्य अभाव कहते हैं-असंयतसम्यग्दृष्टि आदि चार गुणस्थानोंमेंसे किसी एक गुणस्थानमें सात 1. -लन लोभ--- मु.। 2. --याणामन्त-- म.। 3. गमपगमय्य तद-- मु., ता.। 4 --वस्थितस्य मु., ता.। 5. .-दात्यतीकृतकृ-- मु. । Jain Education International www.jainelibrary.org For Private & Personal Use Only
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy