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________________ --- 9135.8888] नवमाऽध्यायः [333 स्तुरीयमार्तं निदानमित्युच्यते । $ 885. तदेतच्चतुर्विधमात किस्वाभिकमिति चेदुच्यते-- तदविरतदेशविरतप्रभत्तसंयतानाम् ॥34॥ 8886. अविरता असंयतसम्यग्दष्टयन्ताः । देशविरताः संयतासंयताः। प्रमत्तसंयताः पंचदशप्रमादोपेताः क्रियानुष्ठायिनः । तत्राविरतदेशविरतानां चविधमप्या तं भवति; असंयमपरिणामोपेतत्वात् । प्रमत्तसंयतानां तु निदानवय॑मन्यदातंत्रयं प्रमादोदयोद्रेकात्कदाचित्स्यात् ।। $ 887. व्याख्यातमार्तं संज्ञादिभिः। द्वितीयस्य संज्ञाहेतुस्वामिनिर्धारणार्थमाह हिंसानतस्तेविषयसंरक्षणेभ्यो रौद्रमविरतदेशविरतयोः ॥35॥ $ 888. हिंसादीन्युक्तलक्षणानि । तानि रौद्रध्यानोत्पतेनिमित्तीभवन्तीति हेतु निर्देशो विज्ञायते । तेन हेतुनिर्देशनानुवर्तमानः स्मृतिसमन्वाहारः' अभिसंबध्यते । हिंसायाः स्मृतिसमन्वाहार इत्यादि । तद्रौद्रध्यानमविरतदेशविरतयोर्वेदितव्यम् । अविरतस्य भवतु रौद्रध्यानं, देशविरतस्य कथम् ? तस्यापि हिंसाद्यावेशाद्वित्तादिसंरक्षणतन्त्रत्वाच्च कदाचिद् भवितुमर्हति । तत्पुनर्नारकालिए मनःप्रणिधानका होना अर्थात् संकल्प तथा निरन्तर चिन्ता करना निदान नामका चौथा आर्तध्यान कहा जाता है। 6 885. इस चार प्रकारके आर्तध्यानका स्वामी कौन है यह बतलाने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं यह आर्तध्यान अविरत, देशविरत और प्रमत्तसंयत जीवोंके होता है ।।34॥ 8886. असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तकके जोव अविरत कहलाते हैं, संयतासंयत जीव देशविरत कहलाते हैं और पन्द्रह प्रकारके प्रमादसे युक्त क्रिया करनेवाले जीव प्रमत्तसंयत कहलाते हैं। इनमें से अविरत और देशविरत जीवोंक चारों ही प्रकारका आतध्यान होता है, क्योंकि ये असंयमरूप परिणामसे युक्त होते हैं। प्रमत्तसंयतोंके तो निदानके सिवा बाकीके तीन प्रमादके उदयकी तीव्रतावश कदाचित होते हैं। विशेषार्थ-पुराण साहित्यमें मुनियों द्वारा निदान करनेके कई उदाहरण हैं पर इन उदाहरणोंसे प्रमत्तसंयत अवस्था में उन साधुओंने निदान किया ऐसा अर्थ नहीं लेना चाहिए। एक तो भावलिंगी साधुके आगामी भोगोंकी आकांक्षा होती ही नहीं और कदाचित् होती है तो उस समयसे वह भावलिंगी नहीं रहता ऐसा अर्थ यहाँ ग्रहण करना चाहिए। 8887. संज्ञा आदिके द्वारा आर्तध्यानका व्याख्यान किया। अब दूसरे ध्यानकी संज्ञा, हेतु और स्वामीका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं हिंसा, असत्य, चोरी और विषयसंरक्षणके लिए सतत चिन्तन करना रौद्रध्यान है। वह अविरत और देशविरतके होता है ॥35॥ 8888. हिंसादिकके लक्षण पहले कह आये हैं । वे रौद्रध्यानकी उत्पत्तिके निमित्त होते हैं । इससे हेतुनिर्देश जाना जाता है । हेतुका निर्देश करनेवाले इन हिंसादिकके साथ अनुवृत्तिको प्राप्त होनेवाले 'स्मृतिसमन्वाहार' पदका सम्बन्ध होता है। यथा--हिसाका स्मृतिसमन्वाह आदि । यह रौद्रध्यान अविरत और देशविरतके जानना चाहिए। शंका-रौद्रध्यान अविरतके होओ देशविरतके कैसे हो सकता है ? समाधान–हिंसादिकके आवेशसे या वित्तादिके संरक्षणके परतन्त्र होनेसे कदाचित् उसके भी हो सकता है। किन्तु देशविरतके होनेवाला वह रौद्रध्यान 1. --विधमात ता. मु.। Jain Education International For Private & Personal Use Only .www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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