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________________ -91268 870] नवमोऽध्यायः [349 न्तरेण वा तत्प्रतीकारो वैयावृत्त्यं समाध्या धानविचिकित्साभावप्रवचनवात्सल्याद्यभिव्यक्त्यर्थम् । 5867. स्वाध्यायविकल्पविज्ञानार्थमाह वाचनाप्रच्छनानुप्रेक्षाम्नायधर्मोपदेशाः ।।25।। 8868. निरवद्यग्रन्थार्थोभयप्रदानं वाचना । संशयच्छेदाय निश्चितबलाधानाय वा परानुयोगः प्रच्छना । अधिगतार्थस्य मनसाभ्यासोऽनुप्रेक्षा। घोषशद्धं परिवर्तनमाम्नायः । धर्मकथाद्यनुष्ठानं धर्मोपदेशः । स एष पञ्चविधः स्वाध्यायः किमर्थः ? प्रज्ञातिशयः प्रशस्ताध्यवसायः परमसंवेगस्तपोवृद्धिरतिचारविशुद्धिरित्येवमाद्यर्थः । 8869. व्युत्सर्गभेदनिर्जानार्थमाह - ___ बाह्याभ्यन्तरोपध्योः ॥26॥ 8870. व्युत्सर्जनं व्युत्सर्गस्त्यागः। स द्विविधः-बाह्योपधित्यागोऽभ्यन्तरोपधित्यागश्चेति । अनुपात्तं वास्तुधनधान्यादि बाह्योपधिः । क्रोधादिरात्मभावोऽभ्यन्तरोपधिः कायत्यागश्च नियतकालो यावज्जीवं वाभ्यन्तरोपधित्याग इत्युच्यते। स किमर्थः ? निस्सङ्गत्वनिर्भयत्वजीविताशाव्युदासाद्यर्थः। उनका प्रतीकार करना वैयावृत्त्य तप हैं । यह समाधिकी प्राप्ति, विचिकित्साका अभाव और प्रवचनवात्सल्यकी अभिव्यक्तिके लिए किया जाता है। 8867. स्वाध्यायके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-- वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश यह पाँच प्रकारका स्वाध्याय है ॥25॥ 8868. ग्रन्थ, अर्थ और दोनोंका निर्दोष प्रदान करना वाचना है। संशयका उच्छेद करनेके लिए अथवा निश्चित बलको पुष्ट करनेके लिए प्रश्न करना प्रच्छना है । जाने हुए अर्थका मदमें अभ्यास करना अनुप्रेक्षा है। उच्चारणकी शुद्धिपूर्वक पाठको पुन:-पुनः दुहराना आम्नाय है और धर्मकथा आदिका अनुष्ठान करना धर्मोपदेश है । शंका-यह पूर्वोक्त पाँच प्रकारका स्वाध्याय किसलिए किया जाता है ? समाधान-प्रज्ञामें अतिशय लानेके लिए, अध्यवसायको प्रशस्त करनेके लिए, परम संवेगके लिए, तपमें वृद्धि करनेके लिए और अतीचारोंमें विशुद्धि लाने आदिके लिए किया जाता है। 8869. अब व्युत्सर्ग तपके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैंबाह्य और अभ्यन्तर उपधिका त्याग यह दो प्रकारका व्युत्सर्ग है ॥26॥ 6870. व्युत्सर्जन करना व्युत्सर्ग है जिसका अर्थ त्याग होता है। वह दो प्रकारका है बाह्य उपधित्याग और अभ्यन्तर उपधित्याग। आत्मासे एकत्वको नहीं प्राप्त हुए ऐसे वास्तु, धन और धान्य आदि बाह्य उपधि है और क्रोधादिरूप आत्मभाव अभ्यन्तर उपधि है। तथा नियत काल तक या यावज्जीवन तक कायका त्याग करना भी अभ्यन्तर उपधि त्याग कहा जाता है। यह निःसंगता, निर्भयता और जीविताशाका व्युदास आदि करनेके लिए किया जाता है। विशेषार्थ--यहाँ यह प्रश्न होता है कि जब कि पाँच महाव्रतोंमें परिग्रहत्यागका उपदेश दिया है, दश धर्मोंमें त्याग धर्मका उपदेश दिया है तथा नौ प्रकारके प्रायश्चित्तोंमें व्युसर्ग नामका प्रायश्चित्त अलगसे कहा है ऐसी अवस्थामें पुनः व्युत्सर्ग तपका अलगसे कथन करना कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि इस प्रकार एक ही तत्त्वका पुनः-पुनः कथन करनेसे पुनरुक्त दोष आता है। समाधान यह है कि पांच महाव्रतोंमें जो परिग्रह-त्याग महाव्रत है उसमें गृहस्थसम्बन्धी उपधिके 1. -माध्यायान-- मु.। 2. --व्यक्तार्थम् आ., दि. 1, दि. 2, ना. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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