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________________ 348] सर्वार्थसिद्धौ [9123 6 8638863. विनयविकल्पप्रतिपत्त्यर्थमाह ज्ञानदर्शनचारित्रोपचाराः॥23॥ 8864. 'विनयः' इत्यधिकारेणाभिसंबन्धः क्रियते । ज्ञानविनयो वर्शनविनयश्चारित्रविनय उपचारविनयश्चेति । सबहमानं मोक्षार्थ ज्ञानग्रहणाभ्यासस्मरणाविर्तानविनयः। शंकाविदोषविरहितं तत्त्वार्थश्रद्धानं दर्शनविनयः । तद्वतश्चारित्रे समाहितचित्तता चारित्रविनयः । प्रत्यक्षेष्वाचार्यादिष्वभ्युत्थानाभिगमनाञ्जलिकरणादिरुपचारविनयः । परोक्षेष्वपि कायवाङ्मनोऽभिरंजलिक्रियागुणसंकीर्तनानुस्मरणादिः । 8865. वैयावृत्त्यभेदप्रतिपादनार्थमाह आचार्योपाध्यायतपस्विशैक्षग्लानगणकुलसंघसाधुमनोज्ञानाम् ॥24॥ 8866. वैयावृत्त्यं दशधा भिद्यते । कुतः ? विषयभेदात् । आचार्यवैयावृत्त्यमुपाध्यायवैयावृत्त्यमित्यादि । तत्र आचरन्ति तस्माद् व्रतानीत्याचार्यः। मोक्षार्थ शास्त्रमुपेत्य तस्मावधीयत इत्युपाध्यायः । महोपवासाद्यनुष्ठायी तपस्वी। शिक्षाशीलः शैक्षः। रजादिक्लिष्टशरीरो ग्लानः । गणः स्थविरसंततिः । दीक्षकाचार्य शिष्यसंस्त्यायः कुलम् । चातुर्वर्ण श्रमणनिवहः संघः। चिरप्रत्रजितः साधुः। मनोज्ञो लोकसंमतः । तेषां व्याधिपरिषहमिथ्यात्वाद्युपनिपाते कायचेष्टया द्रव्या ६ 863. विनयके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं ज्ञानविनय, दर्शनविनय, चारित्रविनय और उपचारविनय यह चार प्रकारका विनय है ॥23॥ 8 864. अधिकारके अनुसार 'विनय' इस पदका सम्बन्ध होता है—ज्ञानविनय, दर्शनविनय, चारित्रविनय और उपचारविनय । बहत आदरके साथ मोक्षके लिए ज्ञानका ग्रहण करना, उसका अभ्यास करना और स्मरण करना आदि ज्ञानविनय है। शंकादि दोषोंसे रहित तत्त्वार्थका श्रद्धान करना दर्शनविनय है । सम्यग्दृष्टिका चारित्रमें चित्तका लगना चारित्रविनय है तथा आचार्य आदिकके समक्ष आनेपर खड़े हो जाना, उनके पीछे-पीछे चलना और नमस्कार करना आदि उपचारविनय है तथा उनके परोक्षमें भी काय, वचन और मनसे नमस्कार करना, उनके गुणोंका कीर्तन करना और स्मरण करना आदि उपचारविनय है। 8865. अब वैयावृत्त्यके,भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं आचार्य, उपाध्याय, तपस्वी, शैक्ष, ग्लान, गण, कुल, संघ, साधु और मनोज्ञ इनको वैयावत्यके भेदसे वैयावत्य दश प्रकारका है॥24॥ 8866. वैयावृत्त्यके दश भेद हैं, क्योंकि उसका विषय दश प्रकारका है। यथा--आचार्यवैयावृत्त्य और उपाध्याय-वैयावृत्त्य आदि । जिसके निमित्तसे व्रतोंका आचरण करते हैं वह आचार्य कहलाता है । मोक्षके लिए पास जाकर जिससे शास्त्र पढ़ते हैं वह उपाध्याय कहलाता है। महोपवास आदिका अनुष्ठान करनेवाला तपस्वी कहलाता है। शिक्षाशील शैक्ष कहलाता है। रोग आदिसे क्लान्त शरीरवाला ग्लान कहलाता है । स्थविरोंकी सन्ततिको गण कहते हैं । दीक्षकाचार्यके शिष्यसमुदायको कुल कहते हैं । चार वर्णके श्रमणोंके समुदायको संघ कहते हैं । चिरकालसे प्रवजितको साधु कहते हैं । लोकसम्मत साधुको मनोज्ञ कहते हैं। इन्हें व्याधि होनेपर, परीषहके होनेपर व मिथ्यात्व आदिके प्राप्त होनेपर शरीरकी चेष्टा द्वारा या अन्य द्रव्यद्वारा 1. तत्त्वतश्चा - मु.. 2. --रन्ति सस्या-- आ., दि. 1, दि. 2, ता., ना.। 3. 'उपेत्याधीयते तस्मादु. पाध्यायः।' -पा. म, भा. 3, 3, 111 4. --संस्त्ययः मु.। 5. चातुर्वर्ण्यश्र- मु.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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