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________________ 346] सर्वार्थसिद्धौ [9120 $ 858-- प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यस्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम् ॥20॥ 8858. कथमस्याभ्यन्तरत्वम् ? मनोनियमनार्थत्वात् । प्रमावदोषपरिहारःप्रायश्चित्तम् । पूज्येष्वादरो विनयः । कायचेष्टया द्रव्यान्तरेण चोपासनं वैयावृत्त्यम् । ज्ञानभावनालस्यत्यागः स्वाध्यायः । आत्मात्मीयसंकल्पत्यागो व्युत्सर्गः। चित्तविक्षेपत्यागो ध्यानम् । 8859. तभेदप्रतिपादनार्थमाह नवचतुर्दशपञ्चद्विभेदा यथाक्रमं प्रारध्यानात् ॥21॥ 8860. 'यथाक्रमम्' इति वचनान्नवभेदं प्रायश्चितम्, विनयश्चतुर्विधः, वैयावृत्त्यं दशविधम्, स्वाध्यायः पञ्चविधः, द्विभेदो व्युत्सर्ग इत्यभिसंबध्यते । 'प्राग्ध्यानात्' इति वचनं ध्यानस्य बहुवक्तव्यत्वात्पश्चाद्वक्ष्यत इति। 8861. आद्यस्य भेदस्वरूपनिर्ज्ञानार्थमाह पालोचनप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्गतपश्छेदपरिहारोपस्थापनाः ॥22॥ 8862. तत्र गुरवे प्रमादनिवेदनं दशदोषविजितमालोचनम् । मिथ्यादुष्कृताभिधानादभिव्यक्तप्रतिक्रियं प्रतिक्रमणम् । [तदुभय] संसर्गे सति विशोधनात्तदुभयम् । संसक्तान्नपानोप प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान यह छह प्रकारका आभ्यन्तर तप है ॥20॥ 8858. शंका-इसे आभ्यन्तर तप क्यों कहते हैं ? समाधान-मनका नियमन करनेवाला होनेसे इसे आभ्यन्तर तप कहते हैं । प्रमादजन्य दोषका परिहार करना प्रायश्चित्त तप है। पूज्य पुरुषोंका आदर करना विनय तप है । शरीरकी चेष्टा या दूसरे द्रव्यद्वारा उपासना करना वैयावृत्त्य तप है। आलस्यका त्यागकर ज्ञानकी आराधना करना स्वाध्याय तप है। अहंकार और ममकाररूप संकल्पका त्याग करना व्युत्सर्ग तप है, तथा चित्तके विक्षेपका त्याग करना ध्यान तप है। 8859. अब इनके भेदोंको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैंध्यानसे पूर्वके आभ्यन्तर तपोंके अनुक्रमसे नौ, चार, दश, पांच और दो भेद है ॥21॥ 8860. सूत्रमें 'यथाक्रमम्' यह वचन दिया है। इससे प्रायश्चित्त नौ प्रकारका है, विनय चार प्रकारका है, वैयावृत्त्य दश प्रकारका है, स्वाध्याय पाँच प्रकारका है और व्युत्सर्ग दो प्रकारका है ऐसा सम्बन्ध होता है । सूत्रमें-'प्राग्ध्यानात्' यह वचन दिया है, क्योंकि ध्यानके विषयमें बहुत कुछ कहना है, इसलिए उसका आगे कथन करेंगे। 861. अब पहले आभ्यन्तर तपके भेदोंके स्वरूपका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं ____ आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, परिहार और उपस्थापना यह नव प्रकारका प्रायश्चित्त है ॥22॥ 8862. गुरुके समक्ष दश दोषोंको टालकर अपने प्रमादका निवेदन करना आलोचना है। 'मेरा दोष मिथ्या हो' गुरुसे ऐसा निवेदन करके अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना प्रतिक्रमण है । आलोचना और प्रतिक्रमण इन दोनोंका संसर्ग होनेपर दोषोंका शोधन होनेसे तदुभय प्रायश्चित्त है । संसक्त हुए अन्न, पान और उपकरण आदिका विभाग करना विवेक प्रायश्चित्त है। 1. --रेण वोप- ता.। 2. द्विविधो व्युत्स- । 3. -लोचनम् । आकपिय अणुमाणिय जं दिळं बादर च सुहम च । छह सद्दाउलियं बहजण अव्वत्त सस्सेवि ।। इति दश दोषाः। मिथ्या- मु.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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