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________________ -916 8797] नवमोऽध्यायः 1323 उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः ॥6॥ 8 797. किमर्थमिदमुच्यते ? आद्यं प्रवृत्तिनिग्रहार्थम्, तत्रासमर्थानां प्रवृत्त्युपायप्रदर्शनार्थ द्वितीयम् । इदं पुनर्दशविधधर्माख्यानं समितिषु प्रवर्तमानस्य प्रमादपरिहारार्थ वेदितव्यम् । शरीरस्थितिहेतुमार्गणार्थ परकुलान्युपगच्छतो भिक्षोर्दुष्टजनाक्रोशप्रहसनावज्ञाताडनशरीरव्यापादनादीनां संनिधाने कालुष्यानुत्पत्तिः क्षमा । जात्यादिमदावेशादभिमानाभावो मार्दव माननिहरणम । योगस्यावक्रता आर्जवम् । प्रकर्षप्राप्तलोभान्निवृत्तिः शौचम् । सत्सु प्रशस्तेषु जनेषु साधु वचनं सत्यमित्युच्यते । ननु चैतद् भाषासमितावन्तर्भवति ? नैष दोषः; समिती प्रवर्तमानो मुनिः साधुष्वसाधुषु च भाषाव्यवहारं कुर्वन् हितं मितं च ब्रूयात् अन्यथा रागादनर्थदण्डदोषः स्यादिति वाक्समितिरित्यर्थः । इह पुनः संतः प्रव्रजितास्तद्भक्ता वा तेषु साधु सत्यं ज्ञानचारित्र शिक्षणादिषु बह्वपि कर्तव्यमित्यनुज्ञायते धर्मोपबृहणार्थम् । समितिषु वर्तमानस्य प्राणीन्द्रियपरिहारस्संयमः । कर्मक्षयार्थं तप्यत इति तपः । तदुतरत्र वक्ष्यमाणं द्वादशविकल्पमवसेयम् । संयतस्य योग्यं ज्ञानादिदानं त्यागः । उपात्तेष्वपि शरीरादिषु संस्कारापोहाय ममेदमित्यभिसन्धिनिवृत्तिराकिंचन्यम् । नास्य' किंचनास्तीकिंचनः तस्य भावः कर्म वा आकिंवन्यम् । अनुभूताङ्गनास्मरणकथाश्रवण उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य यह दस प्रकारका धर्म है ॥6॥ 8797. शंका-यह किसलिए कहा है ? समाधान-संवरका प्रथम कारण प्रवत्तिका निग्रह करने के लिए कहा है। जो वैसा करने में असमर्थ है उन्हें प्रवृत्तिका उपाय दिखलानेके लिए दूसरा कारण कहा है। किन्तु यह दश प्रकारके धर्मका कथन समितियोंमें प्रवृत्ति करनेवालेके प्रमादका परिहार करनेके लिए कहा है। शरीरकी स्थितिके कारणकी खोज करनेके लिए पर कुलोंमें जाते हुए भिक्षुको दुष्ट जन गाली-गलौज करते हैं, उपहास करते हैं, तिरस्कार करते हैं, मारते-पीटते हैं और शरीरको तोड़ते-मरोड़ते हैं तो भी उनके कलुषताका उत्पन्न न होना क्षमा है। जाति आदि मदोंके आवेशवश होनेवाले अभिमानका अभाव करना मार्दव है। मार्दवका अर्थ है मानका नाश करना। योगोंका वक्र न होना आर्जव है। प्रकर्षप्राप्त लोभका त्याग करना शौच है। अच्छे पुरुषोंके साथ साधु वचन बोलना सत्य है । शंका-इसका भाषासमितिमें अन्तर्भाव होता है ? समाधान -यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि समितिके अनुसार प्रवृत्ति करनेवाला मनि साध और असाध दोनों प्रकारके मनुष्योंमें भाषाव्यवहार करता हआ हितकारी परिमित वचन बोले. अन्यथा राग होनेसे अनर्थदण्डका दोष लगता है यह वचनसमितिका अभिप्राय है। किन्तु सत्य धर्मके अनुसार प्रवृत्ति करनेवाला मुनि सज्जन पुरुष, दीक्षित या उनके भक्तोंमें साध सत्य वचन बोलता हुआ भी ज्ञान चारित्रके शिक्षण आदिके निमित्तसे बहुविध कर्तव्योंकी सूचना देता है और यह सब धर्मकी अभिवृद्धिके अभिप्रायसे करता है, इसलिए सत्य धर्मका भाषासमितिमें अन्तर्भाव नहीं होता। समितियोंमें प्रवृत्ति करनेवाले मुनि के उनका परिपालन करनेके लिए जो प्राणियोंका और इन्द्रियोंका परिहार होता है वह संयम है । कर्मक्षयके लिए जो तपा जाता है वह तप है । वह आगे कहा जानेवाला बारह प्रकारका जानना चाहिए। संयतके योग्य ज्ञानादिका दान करना त्याग है। जो शरीरादिक उपात्त हैं उनमें भी संस्कारका त्याग करनेके लिए 'यह मेरा है' इस प्रकारके अभिप्रायका त्याग करना आकिंचन्य है । जिसका कुछ नहीं है वह अकिंचन है और उसका भाव या कर्म आकिंचन्य है। अनुभूत स्त्रीका स्मरण न करनेसे, स्त्री1. --ख्यानं प्रवर्त- ता.। 2. --न्युपयतो भिक्षो ता.। 3. --रित्रलक्षणा-- म.। 4. --नास्ति किंचनास्याकि-- मु., दि. 1, दि. 2।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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