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________________ -9138791] नवमोऽध्यायः [321 6789. यतः संसारकारणादात्मनो गोपनं भवति सा गुप्तिः । प्राणिपीडापरिहारायं सम्यगयनं समितिः । इष्टे स्थाने धत्ते इति धर्मः। शरीरादीनां स्वभावानुचिन्तनमनुप्रेक्षा । सुवादिवेदनोत्पत्तो कर्मनिर्जरार्थं सहनं परिषहः । परिषहस्य जयः परिषहजयः। चारित्रशब्द आदिसूत्रे व्याख्यातार्थः । एतेषां गुप्त्यादीनां संवरणक्रियायाः साधकतमत्वात् करणनिर्देशः । संवरोऽधिकृतोऽपि 'म' इति तच्छब्देन परामुश्यते गुप्त्यादिभिः साक्षात्संबन्धनार्थः । किं प्रयोजनम् ? अवधारणार्थम् । स एष संवरो गुप्त्यादिभिरेव नान्ये नोपायेनेति । तेन तीर्थाभिषेकदीक्षाशीर्षाप-4 हारदेवताराधनादयो निवर्तिता भवन्ति; रागद्वेषमोहोपात्तस्य कर्मणोऽन्यथा निवृत्त्यभावात् । 8 790. संवरनिर्जराहेतुविशेषप्रतिपादनार्थमाह तपसा निर्जरा च ॥3॥ 8 791. तपो धर्मेऽन्तर्भूतमपि पृथगुच्यते उभयसाधनत्वख्यापनार्थ संवरं प्रति प्राधान्यप्रतिपावनाचनन च सपोऽभ्युदयांगमिष्टं देवेन्द्रादिस्थानप्राप्तिहेतत्वाभ्युपगमात', मिर्जरांगं स्यादिति ? नैष दोषः; एकस्यानेककार्यदर्शनादग्निवत् । यथाग्निरेकोऽपि विक्लेदन 8789. जिसके बलसे संसारके कारणोंसे आत्माका गोपन अर्थात् रक्षा होती है वह गुप्ति है । प्राणिपीड़ाका परिहार करनेके लिए भले प्रकार आना-जाना, उठाना-धरना, ग्रहण करना व मोचन करना समिति है। जो इष्ट स्थानमें धरता है वह धर्म है । शरीरादिकके स्वभावका बार बार चिन्तन करना अनुप्रेक्षा है। क्षुधादि वेदनाके होनेपर कर्मोकी निर्जरा करने के लिए उसे सह लेना परिषह है और परिषहका जीतना परिषहजय है। चारित्र शब्दका प्रथम सूत्र में व्याख्यान कर आये हैं। ये गुप्ति आदिक संवररूप क्रियाके अत्यन्त सहकारी हैं, अतएव सूत्रमें इनका करण रूपसे निर्देश किया है । संवरका अधिकार है तथापि गुप्ति आदिकके साथ साक्षात् सम्बन्ध दिखलानेके लिए इस सूत्रमें उसका 'सः' इस पदके द्वारा निर्देश किया है । शंका-इसका क्या प्रयोजन है ? समाधान-अवधारण करना इसका प्रयोजन है। यथा-वह संवर गुप्ति आदिक द्वारा ही हो सकता है, अन्य उपायसे नहीं हो सकता। इस कथनसे तीर्थ यात्रा करना, अभिषेक करना, दीक्षा लेना, उपहार स्वरूप सिरको अर्पण करना और देवताकी आराधना करना आदिका निराकरण हो जाता है, क्योंकि राग, द्वेष और मोहके निमित्तसे ग्रहण किये गये कर्मका अन्यथा अभाव नहीं किया जा सकता। 8790. अब संवर और निर्जराके हेतु विशेषका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैंसपसे निर्जरा होती है और संवर भी होता है ॥3॥ $ 791. तपका धर्ममें अन्तर्भाव होता है फिर भी वह संवर और निर्जरा इन दोनोंका कारण हैं और संवरका प्रमुख कारण है यह बतलानेके लिए उसका अलगसे कथन किया है। शंका-तपको अभ्युदयका कारण मानना इष्ट है, क्योंकि वह देवेन्द्र आदि स्थान विशेषकी प्राप्तिके हेतुरूपसे स्वीकार किया गया है, इसलिए वह निर्जराका कारण कैसे हो सकता है? धान-यद कोई दोष नहीं है. क्योंकि अग्निके समान एक होते हुए भी इसके अनेक कार्य देखे जाते हैं । जैसे अग्नि एक है तो भी उसके विक्लेदन, भस्म और अंगार आदि अनेक कार्य 1. 'संसारदुःलतः सत्त्वान्यो धरत्युत्तमे सुखे ।' रत्न. पृ. 250 । 2. --संबन्धार्थः । प्रयो-- मु.। 3. --मार्थः । समु.। 4. 'शीर्षोपहारादिभिरात्मदुःखैर्देवान् किलाराध्य सुखाभिवृद्धाः । सिद्धयन्ति दोषापचयानपेक्षा युक्तं च तेषां त्वमृषिनं येषाम् ॥' युक्त्यनु. श्लो. 39। 5.-मात्, कथं मु.। 6. --कोऽपि क्लेदभस्मसाभवादिप- मा.। -कोऽपि विक्लेदभस्मसादभावादिप्र- दि.21-कोऽपि पवनविक्लेदभस्मसाभावादिप्र-दि. 1। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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