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________________ 320] सर्वार्थसिद्धौ [912 6 788देवगतिप्रायोग्यानुपूर्व्यागुरुलघूपघातपरघातोच्छ्वासप्रशस्तविहायोगतित्रसबादरपर्याप्तप्रत्येकशरीरस्थिरशुभसुभगसुस्वरादेयनिर्माणतीर्थकराख्या बध्यन्ते । तस्यैव चरमसमये चतस्रः प्रकृतयो हास्यरतिभयजुगुप्सासंज्ञा बन्धमुपयान्ति। ता एतास्तीवकषायास्रवास्तदभावानिद्दिष्टाद्भागादूर्व संवियन्ते। अनिवृत्तिबादरसांपरायस्यादिसमयादारभ्य संख्येयेष भागेषु पुवेदक्रोधसंज्वलनौ बध्येते । तत ऊर्ध्वं शेषेषु संख्येयेषु भागेषु मान संज्वलनमायासंज्वलनौ बन्धमुपगच्छतः । तस्यैव चरमसमये लोभसंज्वलनो बन्धमेति । ता एताः प्रकृतयो मध्यमकषायास्रवास्तदभावे निर्दिष्टस्य भागस्योपरिष्टात्संवरमाप्नुवन्ति । पञ्चानां ज्ञानावरणानां चतुर्णा दर्शनावरणानां यशःकीर्तेरुच्चर्गोत्रस्य पञ्चानामन्तरायाणां च मन्दकषायात्रवाणां सूक्ष्मसांपरायो बन्धकः । तदभावादुत्तरत्र' तेषां संवरः । केवलेनैव योगेन सद्वेद्यस्योपशान्तकषायक्षीणकषायसयोगानां बन्धो भवति। तदभावादयोगकेवलिनस्तस्य संवरो भवति ।। 8788. उक्तः संवरस्तद्धेतु प्रतिपादनार्थमाह स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरिषहजयचारित्रैः ॥2॥ वैक्रियिक शरीर अंगोपांग, आहारक शरीर अंगोपांग, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, देवगति प्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परधात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, निर्माण और तीर्थंकर ये तीस प्रकृतियाँ बन्धको प्राप्त होती हैं। तथा इसी गुणस्थानके अन्तिम समयमें हास्य, रति, भय और जुगुप्सा ये चार प्रकृतियाँ बन्धको प्राप्त होती हैं। ये तीव्र कषायसे आस्रवको प्राप्त होनेवाली प्रकतियाँ हैं, इसलिए तीव्र कषायका उत्तरोत्तर अभाव होनेसे विवक्षित भागके आगे उनका संवर होता है । अनिवृत्ति बादर साम्परायके प्रथम समयसे लेकर उसके संख्यात भागोंमें पुवेद और क्रोध संज्वलनका बन्ध होता है। इससे आगे शेष रहे संख्यात भागोंमें मान संज्वलन और माया संज्वलन ये दो प्रकृतियाँ बन्धको प्राप्त होती हैं और उसीके अन्तिम समयमें लोभ संज्वलन बन्धको प्राप्त होती है। इन प्रकृतियोंका मध्यम कषायके निमित्तसे आस्रव होता है, अतएव मध्यम कषायका उत्तरोत्तर अभाव होनेपर विवक्षित भागके आगे उनका संवर होता है ।मन्द कषाय के निमित्तसे आस्रवको प्राप्त होनेवाली पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, यश:कीर्ति, उच्चगोत्र और पाँच अन्तराय इन सोलह प्रकृतियोंका सूक्ष्मसाम्पराय जीव बन्ध करता है, अतः मन्द कषायका अभाव होनेसे आगे इनका संवर होता है । केवल योगके निमित्तसे आस्रवको प्राप्त होनेवाली साता वेदनोयका उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय और सयोगकेवली जीवोंके बंध होता है। योगका अभाव हो जानेसे अयोगकेवलीके उसका संवर होता है । विशेषार्थ-संवर जीवनमें नये दोष और दोषोंके कारण एकत्रित न होने देनेका मार्ग है। संवरके होनेपर ही संचित हुए दोषों व उनके कारणोंका परिमार्जन किया जा सकता है और तभी मुक्ति-लाभ होता है । साधारणत: वे दोष और उनके कारण क्या हैं यहाँ इनकी गुणस्थानक्रमसे विस्तृत चर्चा की गयी है। प्राणीमात्रको इन्हें समझकर संवरके मार्गमें लगना चाहिए यह उक्त कथनका भाव है। 8788. संवरका कथन किया । अब उसके हेतुओंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते है वह संवर गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परिषहजय और चारित्रसे होता है ॥2॥ 1. मानमाया- मु.। 2. -भावात्तदु- मु.। 3. तद्भेदप्रति- मु.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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