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________________ -81118755] अष्टमोऽध्यायः [305 कर्कशनाम मदुनाम गुरुनाम लघुनाम स्निग्धनाम रूक्षनाम शीतनाम उष्णनाम चेति । यन्निमित्तो रसविकल्पस्तद्रसनाम । तत्पञ्चविधम्-तिक्तनाम कटुकनाम कषायनाम आम्लनाम मधुरनाम चेति । यदुदयप्रभवो गन्धस्तद्गन्धनाम । तद्विविधम्-सुरभिगन्धनाम असुरभिगन्धनाम चेति । यद्धेतुको वर्णविभागस्तद्वर्णनाम । तत्पंचविधम्-कृष्णवर्णनाम नीलवर्णनाम रक्तवर्णनाम हारिद्र वर्णनाम शुक्लवर्णनाम चेति । पूर्वशरीराकाराविनाशो यस्योदयाद् भवति तदानुपूर्व्यनाम। तच्चतुर्विधम् -नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्व्यनाम तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्व्यनाम मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपर्व्यनाम देवगतिप्रायोग्यानपर्व्यनाम चेति । यस्योदयादयःपिण्डवद गुरुत्वान्नाधः पतति न चार्क तूलवल्लघुत्वादूवं गच्छति तदगुरुलघुनाम । यस्योदयात्स्वयंकृतोद्बन्धन मरुप्रपतनादिनिमित्त उपघातो भवति तदुपघातनाम । यन्निमित्तः परशस्त्रादेाघातस्तत्परघातनाम । यदुदयान्निर्वृत्तमातपनं तदातपनाम । तदादित्ये वर्तते। यन्निमित्तमुद्योतनं तदुद्योतनाम । तच्चन्द्रखद्योतादिषु वर्तते । यद्धतुरुच्छवासस्तदुच्छ्वासनाम । विहाय आकाशम् । तत्र गतिनिर्वर्तकं तद्विहायोगतिनाम। तद्विविधम-प्रशस्ताप्रशस्तभेदात् । शरीरनामकमोदयान्निवत्यमानं शरीरमेकात्मोपभोगकारणं यतो भवति तत्प्रत्येकशरीरनाम। बहनामात्मनामुपभोगहेतुत्वेन साधारणं शरीरं यतो भवति तत्साधारणशरीरनाम । यदुदयाद् द्वीन्द्रियादिषु जन्म तत्त्रसनाम् । यन्निमित्त एकेन्द्रियेषु प्रादुर्भावसपाटिकासंहनन नामकर्म । जिसके उदयसे स्पर्शकी उत्पत्ति होती है वह स्पर्श नामकर्म है। वह आठ प्रकारका है-कर्कश नामकर्म, मदु नामकर्म, गुरु नामकर्म, लघ नामकर्म, स्निग्ध नामकर्म, रूक्ष नामकर्म, शीत नामकर्म और उष्ण नामकर्म । जिसके उदयसे रसमें भेद होता है वह रस नामकर्म है । वह पाँच प्रकारका है-तिक्त नामकर्म, कटु नामकर्म, कषाय नामकर्म, आम्ल नामकर्म और मधुर नामकर्म । जिसके उदयसे गंधकी उत्पत्ति होती है वह गंध नामकर्म है । वह दो प्रकारका है--सुरभिगन्ध नामकर्म और असुरभिगन्ध नामकर्म । जिसके निमित्तसे वर्ण में विभाग होता है वह वर्ण नामकर्म है । वह पाँच प्रकारका है-कृष्णवर्ण नामकर्म, नीलवर्ण नामकर्म, रक्तवर्ण नामकर्म, हारिद्रवर्ण नामकर्म और शुक्लवर्ण नामकर्म । जिसके उदयसे पूर्व शरीरके आकारका विनाश नहीं होता है वह आनुपूर्व्य नामकर्म है । वह चार प्रकारका है--नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्व्य नामकर्म, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्व्य नामकर्म, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्व्य नामकर्म और देवगतिप्रायोग्यानुपूर्व्य नामकर्म । जिसके उदयसे लोहेके पिण्डके समान गुरु होनेसे न तो नीचे गिरता है और न अर्कतूलके समान लघु होनेसे ऊपर जाता है वह अगुरुलघु नामकर्म है। जिसके उदयसे स्वयंकृत उद्बन्धन और मरुस्थल में गिरना आदि निमित्तक उपघात होता है वह उपघात नामकर्म है। जिसके उदयसे परशस्त्रादिकका निमित्त पाकर व्याघात होता है वह परघात नामकर्म है। जिसके उदयसे शरीरमें आतपकी रचना होती है वह आतप नामकर्म है। वह सूर्यबिम्बमें होता है। जिसके निमित्तसे शरीरमें उद्योत होता है वह उद्योत नामकर्म है । वह चन्द्रबिम्ब और जगुन् आदिमें होता है । जिसके निमित्तसे उच्छ्वास होता है वह उच्छ्वास नामकर्म है। विहायस्का अर्थ आकाश है । उसमें गतिका निर्वर्तक कर्म विहायोगति नामकर्म है । प्रशस्त और अप्रशस्तके भेदसे वह दो प्रकारका है। शरीर नामकर्मके उदयसे रचा जानेवाला जो शरीर जिसके निमित्तसे एक आत्माके उपभोगका कारण होता है वह प्रत्येकशरोर नामकर्म हैं । बहुत आत्माओंके उपभोगका हेतुरूपसे साधारण शरीर जिसके निमित्तसे होता है वह साधारणशरीर नामकर्म है। जिसके उदयसे द्वीन्द्रियादिकमें जन्म होता है वह त्रस नामकर्म है। जिसके निमित्तसे एकेन्द्रियोंमें उत्पत्ति होती है वह स्थावर नामकर्म है। जिसके उदयसे अन्यजनप्रीतिकर अवस्था 1. --नाम दुरभिगन्ध- आ., दि. 1, दि. 2। 2. हरिद्वणं- मु.। 3. मरुत्प्र- मु. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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