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________________ सर्वार्थसिद्धि 'बादरः स्थूलः साम्परायः कषायस्तदुक्यो यस्यासो बादरसाम्परायः संयतः। स च मोहप्रकृतीः कश्चिदुपशमयतीत्युपशमकः । कश्चित् पयतीति अपकः । तत्र सर्वेषां द्वाविंशतेरपि भुवाबीनां परोषहाणामवर्शनान्तानां सम्भवः।' जिसके कषाय स्थूल होता है वह बादरसाम्पराय संयत कहलाता है। उनमेंसे कोई मोहनीयका उपशम करता है, इसलिए उपशमक कहलाता है और कोई क्षय करता है, इसलिए क्षपक कहलाता है । इसके सभी बाईस क्षुधा आदि परीषहोंका सद्भाव सम्भव है । इस व्याख्यानसे स्पष्ट है कि सिद्धसेनगणिके अभिप्रायसे तत्त्वार्थभाष्यकार वाचक उमास्वातिको यहाँ बादरसाम्पराय' पदसे नौवाँ गुणस्थान ही इष्ट है। प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीने तत्वार्थसूत्रकी व्याख्यामें यही अर्थ स्वीकार किया है। वे लिखते हैं जिसमें साम्पराय-कषायका बादर अर्थात् विशेषरूपमें सम्भव हो वरसाम्पराय नामक नोवं गुणस्थानमें बाईस परीषह होते हैं। इसका कारण यह है कि परीषहोंके कारणभूत सभी कर्म वहाँ होते हैं।' 'वादरसाम्पराय' पदकी ये दो व्याख्याएँ हैं जो क्रमशः सर्वार्थ सिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यमें उपलब्ध होती हैं। सर्वार्थ सिद्धिकी व्याख्याके अनुसार बादरसाम्पराय पद गुणस्थान-विशेषका सूचक न होकर अर्थपरक निर्देश होनेसे दर्शनमोहनीयके उदय में अदर्शन परीषह होता है इस अर्थकी सङ्गति बैठ जाती है । किन्तु तत्त्वार्थभाष्यकी व्याख्याको स्वीकार करने पर एक नयी अड़चन उठ खड़ी होती है। दर्शनमोहनीयका सत्त्व उपशान्तमोह गुणस्थान तक रहता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि उन्होंने दर्शनमोहनीयके सत्त्वकी अपेक्षा बादरसाम्पराय नामक नौवें गुणस्थान तक अदर्शन परीषह कहा होगा। किन्तु इस मतको स्वीकार करने पर दो नयी आपत्तियां और सामने आती हैं। प्रथम तो यह कि यदि उन्होंने दर्शनमोहनीयके सत्त्वकी अपेक्षा अदर्शन परीषहका सद्भाव स्वीकार किया है तो उसका सद्भाव ग्यारहवें गणस्थान तक कहना चाहिए। दूसरी यह कि 'क्षुत्पिपासा-शीतोष्ण--' इत्यादि सूत्रकी व्याख्या करते हुए वह कहते हैं कि 'पञ्चानामपि कर्मप्रकृतीनामुक्या ते परीषहाः प्रादुर्भवन्ति।' अर्थात् पाँच कर्मप्रकृतियोंके उदयसे ये परीषह उत्पन्न होते हैं। सो पूर्वोक्त अर्थ के स्वीकार करने पर इस कथनकी सङ्गति नहीं बैठती दिखलाई देती। क्योंकि एक ओर तो दर्शनमोहनीयके सत्त्वकी अपेक्षा अदर्शन परीषहको नौवें गुणस्थान तक स्वीकार करना और दूसरी ओर सब परीषहोंको पाँच कर्मोके उदयका कार्य कहना ये परस्पर विरोधी दोनों कथन कहाँ तक युक्तियुक्त हैं यह विचारणीय हो जाता है। स्पष्ट है कि सिद्धसेन गणिकी टीकाके अनुसार तत्त्वार्थभाष्यका कथन न केवल स्खलित है अपितु वह मूल सूत्रकारके अभिप्रायके प्रतिकूल भी है, क्योंकि मूल सूत्रकारने इन परीषहोंका सद्भाव कर्मों के उदयकी मुख्यतासे ही स्वीकार किया है। अन्यथा वे अदर्शन परीषहका सदभाव और चारित्रमोहके निमित्तसे होनेवाले नारन्य आदि परीषहोंका सद्भाव उपशान्तमोह नामक ग्यारहवें गुणस्थान तक अवश्य कहते । नाग्न्य, अरति, स्त्री, निषद्या, आक्रोश, याचना और सत्कार-पुरस्कार ये सात परीषह चारित्रमोहनीयके उदयमें होते हैं। सामान्यत: चारित्रमोहनीयका उदय यद्यपि सूक्ष्म साम्परायिक नामक दसवें गुणस्थान तक होता है, इसलिए इन सात परीषहोंका सद्भाव दसवें गुणस्थान तक कहना चाहिए था ऐसी शंका की जा सकती है, परन्तु इनका दसवें गुणस्थान तक सद्भाव न बतलानेके दो कारण हैं। प्रथम तो यह कि चारित्रमोहनीयके अवान्तरभेद क्रोध, मान और मायाका तथा नी नोकषायोंका उदय नौवें गुणस्थानके अमुक भाग तक ही होता है, इसलिए इन परीषहोंका सद्भाव नौवें गुणस्थान तक कहा है। दूसरा यह कि दसवें गुणस्थानमें यद्यपि चारित्रमोहनीयका उदय होता है अवश्य, पर एक लोभ कषायका ही उदय होता है और वह भी अति. सूक्ष्म, इसलिए इनका सद्भाव दसवें गुणस्थान तक न कहकर मात्र नौवें गुणस्थान तक कहा है। तथा क्षुधा, पिपासा, शीत, उष्ण, दंशमशक, चर्या, शय्या, वध, रोग, तणस्पर्श और मल ये ग्यारह Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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