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________________ 286] सर्वार्थसिद्धौ [71308717ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्व्यतिक्रमक्षेत्रवृद्धिस्मृत्यन्तराधानानि ॥30॥ $ 717. परिमितस्य दिगवधेरतिलंघनमतिक्रमः । स समासतस्त्रिविधः--- ऊर्ध्वातिक्रमः अधोऽति'क्रमस्तिर्यगतिक्रमश्चेति । तत्र पर्वताद्यारोहणादू तिक्रमः । कूपावतरणादेरधोऽतिक्रमः । बिलप्रवेशादेस्तिर्यगतिक्रमः । परिगृहीताया दिशो लोभावेशादाधिक्याभिसन्धिः क्षेत्रवृद्धिः । स 'षोऽतिक्रमः प्रमादान्मोहाद्व्यासंगाद्वा भवतीत्यवसेयः । अननुस्मरणं स्मृत्यन्तराधानम् । त एते दिग्विरमणस्यातिचाराः। आनयनप्रेष्यप्रयोगशब्दरूपानुपातपुद्गलक्षेपाः ॥31॥ 8718. आत्मना संकल्पिते देशे स्थितस्य प्रयोजनवशात्किचिदानयेत्याज्ञापनमानयनम् । एवं कुविति नियोगः प्रेष्यप्रयोगः। व्यापारकरान्पुरषान्प्रत्यभ्युत्कासिकादिकरणं शब्दानुपातः । स्त्रविग्रहदर्शनं रूपानुपातः । लोष्टादिनिपातः पुद्गलक्षेपः । त एते देशविरमणस्य पञ्चातिचाराः। कन्दर्पकौत्कुच्यमौखर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोगपरिभोगानर्थक्यानि ॥32॥ 8 719. रागोद्रेकात्प्रहासमिश्रोऽशिष्टवाक्प्रयोगः कन्दर्पः । तदेवोभयं परत्र दुष्टकायकर्मप्रयुक्तं कौत्कुच्यम् । धाष्टर्यप्राय यत्कि बनानर्थकं बहुप्रला पित्वं मौखर्यम् । असमीक्ष्य प्रयोजनमाधिक्येन करणमसमीक्ष्याधिकरणम् । यावताऽर्थेनोपभोगपरिभोगौ सोऽर्थस्ततोऽन्यस्याधिक्य ऊर्ध्वव्यतिक्रम, अधोव्यतिक्रम, तिर्यग्व्यतिक्रम, क्षेत्रवृद्धि और स्मृत्यन्तराधान ये दिग्विरतिव्रतके पांच अतिचार हैं ॥30॥ 8717. दिशाकी जो मर्यादा निश्चित की हो उसका उल्लंघन करना अतिक्रम है। वह संक्षेपसे तीन प्रकारका है-ऊर्ध्वातिक्रम. अधोऽतिक्रम और तिर्यगतिक्रम । इनमेंसे मर्यादाके बाहर पर्वतादिक पर चढ़नेसे ऊर्ध्वातिक्रम होता है, कुआँ आदिमें उतरने आदिसे अधोऽतिक्रम होता है और बिल आदिमें घुसनेसे तिर्यगतिक्रम होता है। लोभके कारण मर्यादा की हुई दिशाके बढ़ानेका अभिप्राय रखना क्षेत्रवृद्धि है। यह व्यतिक्रम प्रमादसे, मोहसे या व्यासंगसे होता है। मर्यादाका स्मरण न रखना स्मृत्यन्तराधान है। ये दिग्विरमण व्रतके पाँच अतिचार हैं। आनयन, प्रेष्यप्रयोग, शब्दानुपात, रूपानुपात और पुद्गलक्षेप ये देशविरति व्रतके पाँच अतिचार हैं ॥31॥ 8718. अपने द्वारा संकल्पित देशमें ठहरे हुए पुरुषको प्रयोजनवश किसी वस्तुको लानेकी आज्ञा करना आनयन है । ऐसा करो इस प्रकार काममें लगाना प्रेष्यप्रयोग है। जो पुरुष किसी उद्योगमें जुटे हैं उन्हें उद्देश्य कर खाँसना आदि शब्दानुपात है। उन्हीं पुरुषोंको अपने शरीरको दिखलाना रूपानुपात है । ढला आदिका फेंकना पुद्गलक्षेप है । इस प्रकार देशविरमण व्रतके पाँच अतिचार हैं। ... कन्दर्प, कौत्कुच्य, मौखर्य, असमीक्ष्याधिकरण और उपभोगपरिभोगानर्थक्य ये अनर्थदण्डविरति व्रतके पाँच अतिचार हैं ॥32॥ 719. रागभावकी तीव्रतावश हास्यमिश्रित असभ्य वचन बोलना कन्दर्प है। परिहास और असभ्यवचन इन दोनोंके साथ दूसरेके लिए शारीरिक कुचेष्टाएं करना कौत्कुच्य है। धीठताको लिये हुए निःसार कुछ भी बहुत बकवास करना मौखर्य है । प्रयोजनका विचार किये बिना मर्यादाके बाहर अधिक काम करना असमीक्ष्याधिकरण है । उपभोग परिभोगके लिए जितनी 1. अधोऽतिक्रमः विलप्र-- मु.। 2. मोहाद्यासङ्गा-मु.। 3. नयेदित्या-- आ., दि. 1, दि. 2। 4. -प्रायं बहु- आ., दि. 1, दि. 2 । 5. --प्रलपितं मौ- मु. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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