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________________ 276] सर्वार्थसिद्धी [7119 § 698 स्येष्टत्वात् । न हिंसाद्युपरति' मात्र व्रताभिसंबन्धाद् व्रतो भवत्यन्तरेण शल्याभावम् । सति शल्यापगमे व्रतसंबन्धाद् व्रती विवक्षितो यथा बहुक्षीरघृतो गोमानिति व्यपदिश्यते । बहुक्षीरघृताभावात्सतीष्वपि गोषु न गोमांस्तथा सशत्यत्वात्सत्स्वपि व्रतेषु न वृती । यस्तु निःशल्यः स व्रती । $ 698 तस्य भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह गार्यनगारश्च ॥19॥ 8699. प्रतिश्रयाथिभिः अंग्यते इति अगारं वेश्म, तद्वानगारी । न विद्यते अगारमस्येत्य नगरः । द्विविधो वृती अगारी अनगारश्च । ननु चात्र विपर्ययोऽपि प्राप्नोति शून्यागारदेवकुलाडावासस्य मुनेरगारित्वम् अनिवृत्तविषयतृष्णस्य कुतश्चित्कारणाद् गृहं विमुच्य वने वसतोऽनगरत्वं च प्राप्नोतीति' ? नैष दोषः; भावागारस्य विवक्षितत्वात् । चारित्रमोहोदये सत्यगारसंबन्धं प्रत्यनिवृत्तः परिणामो भावागारमित्युच्यते । स यस्यास्त्यसावगारी वने वसन्नपि । गृहे वसन्नपि तदभावादनगार इति च भवति । ननु चागारिणो वृतित्वं न प्राप्नोति; असकलवूतत्वात् ? नैष दोषः ; नैगमादिनयापेक्षया अगारिणोऽपि वृतित्वमुपपद्यते नगरावासवत् । यथा गृहे अपवरके वा वसन्नपि नगरावास इत्युच्येत तथा असकलवृतोऽपि नैगमसंग्रहव्यवहारनयापेक्षया व्रतीति + रहित होनेसे व्रती नहीं हो सकता । उदाहरणार्थं देवदत्तके हाथमें लाठी होनेपर वह छत्री नहीं हो सकता ? समाधान - व्रती होनेके लिए दोनों विशेषणोंसे युक्त होना आवश्यक है, यदि किसीने शल्योंका त्याग नहीं किया और केवल हिंसादि दोषोंको छोड़ दिया तो वह वृती नहीं हो सकता । यहाँ ऐसा व्रती इष्ट है जिसने शल्योंका त्याग करके व्रतोंको स्वीकार किया है। जैसे जिसके यहाँ बहुत घी दूध होता है वह गायवाला कहा जाता है । यदि उसके घी दूध नहीं होता और गायें हैं तो वह गायवाला नहीं कहलाता, उसी प्रकार जो सशल्य है व्रतोंके होनेपर भी वह व्रती नहीं हो सकता । किन्तु जो निःशल्य है वह व्रती है । 8698. अब उसके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं उसके अगारी और अनागार ये दो भेद हैं ॥19॥ 8 699. आश्रय चाहनेवाले जिसे अंगीकार करते हैं वह अगार है । अगारका अर्थ वेश्म अर्थात् घर है । जिसके घर है वह अगारी है । और जिसके घर नहीं है वह अनगार है इस तरह व्रती दो प्रकारका है—अगारी और अनगार । शंका- अभी अगारी और अनगारका जो लक्षण कहा है उससे विपरीत अर्थ भी प्राप्त होता है, क्योंकि पूर्वोक्त लक्षणके अनुसार जो मुनि शून्य घर और देवकुलमें निवास करते हैं वे अगारी हो जायेंगे और विषयतृष्णाका त्याग किये बिना जो किसी कारणसे घरको छोड़कर वनमें रहने लगे हैं वे अनगार हो जायेंगे ? समाधानयह कोई दोष नहीं है; क्योंकि यहाँपर भावागार विवक्षित है । चारित्र मोहनीयका उदय होने पर जो परिणाम घरसे निवृत्त नहीं है वह भावागार कहा जाता है । वह जिसके है वह वनमें निवास करते हुए भी अगारी है और जिसके इस प्रकारका परिणाम नहीं है वह घरमें रहते हुए भी अनगार है। शंका-अगारी व्रती नहीं हो सकता, क्योंकि उसके पूर्ण व्रत नहीं है ? समाधान - यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि नैगम आदि नयोंकी अपेक्षा नगरावासके समान अगारीके भी व्रतीपना बन जाता है । जैसे कोई घरमें या झोपड़ी में रहता है तो भी 'मैं नगरमें रहता हूँ' यह कहा जाता उसी प्रकार जिसके पूरे व्रत नहीं है वह नैगम, संग्रह और व्यवहारनयकी 1, --मात्रसम्ब-- मु.। 2. प्नोति नैष आ., दि. 1, दि. 21 3 वृत्तिपरि- आ., दि 1, दि. 2 । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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