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________________ -618 § 624] [ 249 § 621. अत्राह, अधिकरणमुक्तम्', तत्स्वरूपमनिर्ज्ञातमतस्तदुच्यतामिति । तत्र भेवप्रतिपादनद्वारेणाधिकरणस्वरूपनिर्ज्ञानार्थमाह षष्ठोऽध्यायः श्रधिकरणं जीवाजीवाः ||7|| 8622. उक्तलक्षणा जीवाजीवाः । यद्युक्तलक्षणाः पुनर्वचनं किमर्थम् ? अधिकरणविशेषज्ञापनार्थं पुनर्वचनम् । जीवाजीवा अधिकरणमित्ययं विशेषो ज्ञापयितव्य' इति । कः पुनरसौ ? हिसाद्युपकरणभाव इति । स्यादेतन्मूलपदार्थयोद्वित्वाज्जीवाजीवाविति द्विवचनं न्यायप्राप्तमिति । तन्न, पर्यायाणामधिकरणत्वात् । येन केनचित्पर्यायेण विशिष्टं द्रव्यमधिकरणम्, न सामान्यमिति बहुवचनं कृतम् । जीवाजीवा अधिकरणं कस्य ? आस्त्रवस्येति । अर्थवशादभिसंबन्धो भवति । $ 623. तत्र जीवाधिकरणभेदप्रतिपत्यर्थमाह श्राद्यं संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारितानुमतकषायविशेष स्त्रिस्त्रि स्त्रिश्चतुश्चैकशः ॥8॥ 8624. प्राणव्यपरोपणादिषु प्रमादवतः प्रयत्नावेशः संरम्भः । साधनसमभ्यासीकरणं समारम्भः प्रक्रम आरम्भः । 'योग' शब्दो व्याख्यातार्थः । कृतवचनं स्वातन्त्र्यप्रतिपत्त्यर्थम् । कारिताभिधानं परप्रयोगापेक्षम् । अनुमतशब्दः प्रयोजकस्य मानसपरिणामप्रदर्शनार्थः । अभिहितलक्षणाः 8621. पूर्व सूत्र में 'अधिकरण' पद आया है पर उसका स्वरूप अज्ञात है, इसलिए वह कहना चाहिए ? अब उसके भेदोंके कथन द्वारा उसके स्वरूपका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं अधिकरण जीव और अजीवरूप हैं || 7 || $ 622. जीव और अजीवके लक्षण पहले कह आये हैं । शंका- यदि इनके लक्षण पहले कह आये हैं तो फिरसे इनका उल्लेख किस लिए किया ? समाधान - अधिकरण विशेषका ज्ञान कराने के लिए फिरसे इनका उल्लेख किया है, जिससे जीव और अजीव अधिकरण हैं यह विशेष जताया जा सके । शंका- वह कौन है ? समाधान - हिंसादि उपकरणभाव । शंका-मूल पदार्थ दो हैं इसलिए 'जीवाजीवा' इस प्रकार सूत्रमें द्विवचन रखना न्यायप्राप्त है ? समाधान - यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि उनकी पर्यायोंको अधिकरण माना है । तात्पर्य यह है कि किसी एक पर्याय से युक्त द्रव्य अधिकरण होता है, केवल द्रव्य नहीं, इसलिए सूत्रमें बहुवचन रखा है। जीव और अजीव किसके अधिकरण हैं ? आस्रवके । इस प्रकार प्रयोजनके अनुसार यहाँ आस्रव पदका सम्बन्ध होता हैं । 8623. अब जीवाधिकरणके भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते है पहला जीवाधिकरण संरम्भ, समारम्भ और आरम्भके भेद से तीन प्रकारका, योगोंके भेदसे तीन प्रकारका; कृत, कारित और अनुमतके भेदसे तीन प्रकारका तथा कषायोंके भेदसे चार प्रकारका होता हुआ परस्पर मिलानेसे एक सौ आठ प्रकारका है ॥ 8 ॥ 8624. प्रमादी जीवका प्राणोंकी हिंसा आदिकार्य में प्रयत्नशील होना संरम्भ है । साधनोंका जुटाना समारम्भ है । कार्य करने लगना आरम्भ है । योग शब्दका व्याख्यान पहले कर आये हैं । कर्ताकी कार्यविषयक स्वतन्त्रता दिखलाने के लिए सूत्रमें 'कृत' वचन रखा है । कार्य में दूसरे1. -करणमित्युक्तम् मु. ता. 1 2. -तव्य इत्यर्थः । कः मु. । 3 - जीवा इति मु., दि. 21 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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