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________________ 220} सर्वार्षसिद्धौ [51218566स्थितिमादधानस्य जीवस्य पूर्वोक्तप्राणापानक्रियाविशेषाव्युच्छेदो जीवितमित्युच्यते । तदुच्छेदो मरणम् । एतानि सुखादीनि जीवस्य पुद्गलकृत उपकारः'; मूर्तिमद्धेतुसंनिधाने सति तदुत्पत्तेः । उपकाराषिकारात् 'उपग्रह वचनमनर्थकम् ? नानर्थकम् । स्वोपग्रहप्रदर्शनार्थमिदम् । पुद्गलानां पुगलकृत उपकार इति । तद्यथा-कास्यादीनां भस्मादिभिर्जलादीनां कतकादिभिरयःप्रभृती'नामुदकादिभिरुपकार. क्रियते । 'च'शब्दः किमर्थः ? समुच्चयार्थः । अन्योऽपि पुद्गलकृत उपकारोउस्तीति समुच्चीयते । यथा शरीराणि एवं चक्षुरादीनीन्द्रियाण्यपीति । 8566. एवमाद्यमजीवकृतमुपकारं प्रदर्य जीवकृतोपकारप्रदर्शनार्थमाह परस्परोपग्रहो जीवानाम् ॥21॥ 8567. 'परस्पर'शब्दः कर्मव्यतिहारे वर्तते। कर्मव्यतिहारश्च क्रियाव्यतिहारः । परस्परस्योपग्रहः परस्परोपप्रहः । जीवानामुपकारः । कः पुनरसौ ? स्वामी भृत्यः, आचार्यः शिष्यः, इत्येवमादिभावेन वृत्तिः परस्परोपग्रहः । स्वामी तावद्वित्तत्यागादिना भृत्यानामुपकारे वर्तते । 'भत्याश्च हितप्रतिपादनेनाहितप्रतिषेधेन च । आचार्य उभयलोकफलप्रदोपदेशदर्शनेन तदुपदेशविहितक्रियानुष्ठापनेन च शिष्याणामनुग्रहे वर्तते । शिष्या अपि तदानुकूल्यवृत्त्या आचार्याणाम् । हैं। पर्यायके धारण करनेमें कारणभूत आयुकर्मके उदयसे भवस्थितिको धारण करनेवाले जीवके पूर्वोक्त प्राण और अपानरूप क्रिया विशेष का विच्छेद नहीं होना जीवित है । तथा उसका उच्छेद मरण है । ये सुखादिक जीवके पुद्गलकृत उपकार हैं; क्योंकि मर्त कारणोंके रहने पर ही इनकी उत्पत्ति होती है। शंका-उपकारका प्रकरण होनेसे सूत्रमें उपग्रह शब्दका प्रयोग करना निष्फल है ? समाधान-निष्फल नहीं है, क्योंकि स्वत:के उपकारके दिखलानेके लिए सूत्रमें उपग्रह शब्दका प्रयोग किया है । पुद्गलोंका भी पुद्गलकृत उपकार होता है। यथाकांसे आदिका राख आदिके द्वारा, जल आदिका कतकं आदिके द्वारा और लौह आदिका जल आदिके द्वारा उपकार किया जाता है । शंका-सूत्रमें 'च' शब्द किस लिए दिया है ? समाधान --समुच्चयके लिए । पुद्गलकृत और भी उपकार हैं इसके समुच्चयके लिए सूत्र में 'च' शब्द दिया है । जिस प्रकार गरीर आदिक पुद्गलकृत उपकार हैं उसी प्रकार चक्षु आदि इन्द्रियाँ भी पुद्गलकृत उपकार हैं। 8566. इस प्रकार पहले अजीवकृत उपकारको दिखलाकर अब जीवकृत उपकारके दिखलानेके लिए आगैका सूत्र कहते हैं परस्पर निमित्त होना यह जीवोंका उपकार है ॥21॥ 8567. परस्पर यह शब्द कर्म व्यतिहार अर्थ में रहता है । और कर्मव्यतिहारका अर्थ क्रियाव्यतिहार है। परस्परका उपग्रह परस्परोपग्रह है। यह जीवोंका उपकार है । शंकावह क्या है ? समाधान--स्वामी और सेवक तथा आचार्य और शिष्य इत्यादि रूपसे वर्तन करना परस्परोपग्रह है। स्वामी तो धन आदि देकर सेवकका उपकार करता है और सेवक हित का कथन करके तथा अहितका निषेध करके स्वामीका उपकार करता है । आचार्य दोनों लोक में सुखदायी उपदेश-द्वारा तथा उस उपदेशके अनुसार क्रियामें लगाकर शिष्योंका उपकार करता है और शिष्य भी आचार्यके अनुकूल प्रवृत्ति करके आचार्यका उपकार करते हैं। शंका-उपकारका अधिकार है, इसलिए सूत्रमें फिर से 'उपग्रह' शब्द किसलिए दिया है ? समाधान-पिछले 1. कारः । कुतः । मूर्ति- मु., आ. । 2. -याणां कृतोप- आ. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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