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________________ 190] सर्वार्थ सिद्धौ [4121 8483गतिशरीरपरिग्रहाभिमानतो होनाः ॥21॥ 8483. देशाद्देशान्तरप्राप्तिहेतुर्गतिः । शरीरं वैक्रियिकमुक्तम् । लोभकषायोदयाद्विषयेषु सङ्गः परिग्रहः । मानकषायादुत्पन्नोऽहंकारोऽभिमानः । एतैर्गत्यादिभिरुपर्युपरि होनाः । देशान्तरविषयक्रीडारतिप्रकर्षाभावादुपर्युपरि गतिहीनाः । शरीरं सौधर्मशानयोर्देवानां सप्तारत्निप्रमाणम् । सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः षडरत्निप्रमाणम् । ब्रह्मलोकब्रह्मोत्तरलान्तबकापिष्ठेषु पञ्चारत्निप्रमाणम् । शुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेषु चतुररत्निप्रमाणभ् । आनतप्राणतयोरर्द्धचतुर्थारत्निप्रमाणम् । आरणाच्युतयोस्त्र्यरत्निप्रमाणम् । अधोग्रैवेयकेषु अर्द्धतृतीयारत्निप्रमाणम् । मध्यप्रैवेयकेष्वरनिद्वयप्रमाणम् । उपरिमप्रैवेयकेषु अनुदिशविमानके षु च अध्य रत्नि'प्रमाणम् । अनुत्तरेष्वरत्निप्रमाणम् । परिग्रहश्च विमानपरिच्छदादिरुपर्युपरि हीनः । अभिमानश्चोपर्युपरि तनुकषायत्वाद्धीनः । 8484. पुरस्तात्त्रिषु निकायेषु देवानां लेश्याविधिरुक्तः । इदानों वैमानिकेषु लेश्याविधिप्रतिपत्त्यर्थमाह पीतपदमशुक्ललेश्या द्वित्रिशेषेषु ॥22॥ 8485. पीता च पद्मा च शुक्ला चताः पीतपद्मशुक्लाः । पोतपद्मशुक्ला लेश्या येषां गति, शरीर, परिग्रह और अभिमानको अपेक्षा ऊपर-ऊपरके देव हीन हैं ॥21॥ 8483. एक देशसे दूसरे देशके प्राप्त करनेका जो साधन है उसे गति कहते हैं । यहाँ शरीरसे वक्रियिक शरीर लिया गया है यह पहले कह आये हैं । लोभ कषायक उदयसे विषयोंके संगको परिग्रह कहते हैं। मानकषायके उदयसे उत्पन्न हुए अहंकारको अभिमान कहते हैं। इन गति आदिको अपेक्षा वेमानिक देव कार-ऊपर होन हैं । भिन्न देश में स्थित विषयों में क्रीड़ा विषयक रतिका प्रकर्ष नहीं पाया जाता इसलिए ऊपर-ऊपर गमन कम है। सौधर्म और ऐशान स्वर्गके देवांका शरार सात अरन्निप्रमाण है । सान कुमार आर माहेन्द्र स्वर्गके देवोंका शरीर छह अरनिप्रमाण है। ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव ओर कापिष्ठ कल्पके देवोंका शरोर पाँच अरनिप्रमाण है। शुक्र, महाशुक्र, शतार और सहसार कल्पके देवाका शरीर चार अरनिप्रमाण है आनत और प्राणत कल्पके देवोंका शरीर साढ़े तीन अरलिप्रमाण है। आरण और अच्यूत कल्पके देवोंका शरीर तीन अरत्निप्रमाण है। अधोग्र वेयकमें अहमिन्द्रोंका शरीर ढाई अरनिप्रमाण है। मध्यग्रं वेयकमें अहमिन्द्रोंका शरीर दो अरलिप्रमाण है। उपरिम ग्रं वेयकमें और अनुदिशोंमें अहमिन्द्रोंका शरीर डेढ़ अरनिप्रमाण है। तथा पाँच अनुत्तर विमानोंमें अहमिन्द्रोंका शरीर एक अरनिप्रमाण है । विमानोंको लम्बाई चौड़ाई आदि रूप परिग्रह ऊपर-ऊपर कम है। अल्प कषाय होनेसे अभिमान भी ऊपर-ऊपर कम है। विशेषार्थ-ऊपरके देवोंमें परिग्रह कमती-कमती होता है और पुण्यातिशय अधिकअधिक, इससे ज्ञात होता है कि बाह्य परिग्रहका संचय मुख्यतः पुण्यका फल न होकर मूर्छाका फल है। ऊपर-ऊपर मूर्छा न्यून होती है जो उनके पूर्वभवके संस्कारका फल है, इसलिए परिग्रह भी न्यून-न्यून होता है। 8484. पहले तीन निकायोंमें लेश्याका कथन कर आये। अब वैमानिकोंमें लेश्याओंका ज्ञान कराने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं दो, तीन कल्प युगलोंमें और शेष में क्रमसे पीत, पद्म और शुक्ल लेश्यावाले देव हैं॥22॥ 6485. पोता, पद्मा और शुक्लामें द्वन्द्व समास है, अनन्तर लेश्या शब्दके साथ बहुव्रीहि 1. -रलिमात्रम् । अनु- आ., दि. 1, दि. 2, ता.। 2. च पीत- आ., दि. 2, । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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