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________________ 184] सर्वार्थसिद्धौ [41138466योजनान्युत्पत्य शुक्राः । 'ततस्त्रीणि योजनान्युत्पत्य बृहस्पतयः। ततस्त्रीणि' योजनान्युत्पत्यागारकाः । ततस्त्रीणि योजनान्युत्पत्य शनैश्चराश्चरन्ति । स एष ज्योतिर्गणगोचरो नभोऽवकाशो दशाधिकयोजनशतबहलस्तिर्यगसंख्यातद्वीपसमुद्रप्रमाणो घनोदधिपर्यन्तः । उक्तं च । “णउदुत्तरसत्तसया दससीदी चदुगं तियचउक्कं । तारारविससिरिक्खा बुहभग्गवगुरुअंगिरारसणी ।" 8466. ज्योतिष्काणां गतिविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके ॥13॥ 8467. मेरोः प्रदक्षिणा मेरुप्रदक्षिणा । 'मेरुप्रदक्षिणाः' इति वचनं गतिविशेषप्रतिपत्त्यर्थ विपरीता गतिर्मा विज्ञायोति । 'नित्यगतयः' इति विशेषणमनुपरतक्रियाप्रतिपादनार्थम् । 'नलोक'ग्रहणं विषयार्थम् । अर्धतृतीयेषु द्वीपेषु द्वयोश्च समुद्रयोयोतिष्का नित्यगतयो नान्यत्रेति। ज्योतिष्कविमानानां गतिहेत्वभावात्तवृत्त्यभाव इति चेत् । न; असिद्धत्वात्, गतिरताभियोग्यदेवप्रेरित गतिपरिणामात्कर्मविपाकस्य वैचित्र्यात् । तेषां हि गतिमुखेनैव कर्म विपच्यत इति । अस्सी योजन ऊपर जाकर चन्द्रमा परिभ्रमण करते हैं। इससे चार योजन ऊपर जाकर नक्षत्र हैं। इससे चार योजन ऊपर जाकर बुध हैं । इससे तीन योजन ऊपर जाकर शुक्र है । इससे तीन योजन ऊपर जाकर बृहस्पति हैं । इससे तीन योजन ऊपर जाकर मंगल हैं। इससे तीन योजन ऊपर जाकर शनीचर हैं । यह ज्योतिषियोंसे व्याप्त नभःप्रदेश एक सौ दस योजन मोटा और घनोदधि-पर्यन्त असंख्यात द्वीप-समुद्र-प्रमाण लम्बा है। कहा भी है -- 'इस पृथिवी-तलसे सात सौ नब्बे योजन ऊपर जाकर ताराएँ हैं। पुनः दस योजन ऊपर जाकर सूर्य हैं । पुनः अस्सी योजन ऊपर जाकर चन्द्रमा हैं । पुनः चार योजन ऊपर जाकर नक्षत्र और चार योजन ऊपर जाकर बुध हैं। पुनः चार बार तीन योजन ऊपर जाकर अर्थात् तीन-तीन योजन ऊपर जाकर क्रमसे शुक्र, गुरु, मंगल और शनि हैं।' 8466. अब ज्योतिषी देवोंकी गतिविशेषका ज्ञान करानेके लिए आगे का सूत्र कहते हैंज्योतिषी देव मनुष्यलोकमें मेरुको प्रदक्षिणा करते हैं और निरन्तर गतिशील हैं। 13॥ 8467. 'मेरुप्रदक्षिणा' इस पदमें षष्ठी तत्पुरुष समास है। 'मेरुप्रदक्षिणा' यह वचन गतिविशेष का ज्ञान करनेके लिए और कोई विपरीत गति न समझ बैठे इसके लिए दिया है। वे निरन्तर गतिरूप क्रिया युक्त हैं इस बात का ज्ञान करानेके लिए 'नित्यगतयः' पद दिया है। इस प्रकार के ज्योतिषी देवोंका क्षेत्र बताने के लिए 'नृलोक' पदका गृहण किया है। तात्पर्य यह है कि ढाई द्वीप और दो समुद्रोंमें ज्योतिषी देव निरन्तर गमन करते रहते हैं अन्यत्र नहीं। शंका-ज्योतिषी देवोंके विमानों की गति का कारण नहीं पाया जाता अतः उनका गमन नहीं बन सकता ? समाधान नहीं, क्योंकि यह हेतु असिद्ध है। बात यह है कि गमन करने में रत जो आभियोग्य जातिके देव हैं उनसे प्रेरित होकर ज्योतिषी देवों के विमानों का गमन होता रहता है। यदि कहा जाय कि आभियोग्य जाति के देव निरन्तर गति में ही क्यों रत रहते हैं तो उसका उत्तर यह है कि यह कर्म के परिपाककी विचित्रता है। उनका कर्म गतिरूप से ही 1. ततश्चत्वारि योज- ता.. ना., तत्त्वा.। 2. ततश्चत्वारि योज- ता., ना., तत्त्वा.। 3. -सीदि पदुतिक दुगचउक्कं । तारा- ता.. ना, तत्त्वा.। 4. 'णउदुत्तरसत्तसए दस सीदी चदुद्गे तियबउक्के । तारिणससिरिक्खबुहा सुक्कगुरुंगारमंदगदी।'- ति., सा., गा. 332 । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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