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________________ -3129 § 422] तृतीयोऽध्यायः मतिमा भवति एकविंशतिवर्षसहस्राणि । एवमुत्सपिण्यपि विपरीतक्रमा वेदितव्या । $ 419. अथेतरासु भूमिषु कावस्थेत्यत आह ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः ॥28॥ S 420. ताभ्यां भरत रावताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिता भवन्ति । न हि तत्रोत्सर्पिण्यव सर्पिण्यौ स्तः । $ 421. कि तासु भूमिषु मनुष्यास्तुल्यायुष आहोस्वित्कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्यत आहएकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवत कहारिवर्ष कदैवकुरवकाः ||29|| [167 8422. हैमवते भवा हैमवतका इत्येवं 'वुत्रि' सति मनुष्यसंप्रत्ययो भवति । एवमुत्तरयोरपि । हैमवतकादयस्त्रयः । एकादयस्त्रयः । तत्र यथासंख्यमभिसंबन्धः क्रियते । एकपल्योपमस्थितयो हैमवतकाः । द्विल्योपमस्थितयो हारिवर्षकाः । त्रिपल्योपमस्थितयो दैवकुरवका इति । तत्र पंचसु हैमवतेषु सुषमदुष्षमा सदावस्थिता । तत्र मनुष्या एकपल्योपमायुषो द्विधनुःसहस्रोच्छ्रिताश्चतुर्थभक्ताहारा नीलोत्पलवर्णाः । पञ्चसु हरिवर्षेषु सुषमा सदावस्थिता । तत्र मनुष्या द्विवल्योपमायुषश्चापसहत्रोत्सेधाः षष्ठभक्ताहाराः शंखवर्णाः । पञ्चसु देवकुरुषु सुषमसुषमा सदावस्थिता । हजार वर्षका दुष्षमा काल प्राप्त होता है । तदनन्तर क्रमसे हानि होकर इक्कीस हजार वर्षका अतिदुष्षमा काल प्राप्त होता है । इसी प्रकार उत्सर्पिणी भी इससे विपरीत क्रमसे जाननी चाहिए । 8419. इतर भूमियोंमें क्या अवस्था है अब इस बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं भरत और ऐरावतके सिवा शेष भूमियाँ अवस्थित हैं ॥28॥ 8420. सूत्रमें 'ताभ्याम्' पदसे भरत और ऐरावत क्षेत्रका ग्रहण किया है । इन दोनों क्षेत्रोंसे शेष भूमियाँ अवस्थित हैं । उन क्षेत्रोंमें उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल नहीं हैं । 8421. इन भूमियोंमें मनुष्य क्या तुल्य आयुवाले होते हैं या कुछ विशेषता है इस बात बतलाने के लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं- हैमवत, हरिवर्ष और देवकुरुके मनुष्योंकी स्थिति क्रमसे एक, दो और तीन पल्योपम प्रमाण है ॥29॥ § 422. हैमवत क्षेत्रमें उत्पन्न हुए हैमवतक कहलाते हैं । यहाँ हैमवत शब्दसे 'वुञ ' प्रत्यय करके हैमवतक शब्द बना है जिससे मनुष्योंका ज्ञान होता है । इसी प्रकार आगेके हारिवर्षक और दैवकुरवक इन दो शब्दोंमें जान लेना चाहिए । हैमवतक आदि तीन हैं और एक आदि तीन हैं। यहाँ इनका क्रमसे सम्बन्ध करते हैं जिससे यह अर्थ हुआ कि हैमवत क्षेत्रके मनुष्यों की स्थिति एक पल्योपम है । हरिवर्ष क्षेत्रके मनुष्योंकी स्थिति दो पल्योपम है और देवकुरुक्षेत्र मनुष्यों की स्थिति तीन पल्योपम है । ढाई द्वीपमें जो पाँच हैमवत क्षेत्र हैं उनमें सदा सुषमा का है । वहाँ मनुष्योंकी आयु एक पल्योपम है, शरीरकी ऊँचाई दो हजार धनुष है, उनका आहार एक दिनके अन्तरालसे होता है और शरीरका रंग नील कमलके समान है । पाँच हरिवर्ष नामके क्षेत्रोंमें सदा सुषमा काल रहता है । वहाँ मनुष्योंकी आयु दो पल्योपम है, शरीरकी ऊँचाई चार हजार धनुष है, उनका आहार दो दिनके अन्तरालसे होता है और शरीरका रंग शंखके समान सफेद है । पाँच देवकुरु नामके क्षेत्रमें सदा सुषमसुषमा काल है । वहाँ मनुष्योंकी आयु ती पल्योपम है, शरीरकी ऊँचाई छह हजार धनुष है । उनका भोजन तीन Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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