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________________ 1661 सर्वार्थसिद्धी [31278418भ्याम् । कयोः ? भरतरावतयोः। न तयोः क्षेत्रयोखिहासौ स्तः ; असंभवात् । तत्स्थानां मनुष्याणां वृद्धिहासौ भवतः । अथवाधिकरणनिर्देशः । भरते ऐरावते च मनुष्याणां वृद्धिह्रासाविति। किंकृतौ वृद्धिहासौ ? अनुभवायुःप्रमाणादिकृतौ । अनुभव उपभोगः, आयुर्जीवितपरिमाणम्', प्रमाणं शरीरोत्सेध इत्येवमादिभिर्वृद्धिह्रासौ मनुष्याणां भवतः । किहेतुको पुनस्तौ ? कालहेतुको । स च कालो द्विविधः-उत्सर्पिणी अवसर्पिणी चेति। तद्भवाः प्रत्येकं षट् । अन्वर्थसंज्ञे चैते । अनुभवादिभिरुत्सर्पणशीला उत्सपिणी । तैरेवावसर्पणशीला अवपिणी। तत्रावसर्पिणी षड्विधा-सुषमसुषमा सुषमा सुषमदुष्षमा दुष्षमसुषमा दुष्षमा अतिदुष्षमा चेति । उत्सपिण्यपि अतिदुष्षमाद्या सुषमसुषमान्ता षड्विधैव भवति । अवपिण्याः परिमाणं दशसागरोपमकोटीकोटयः । उत्सपिण्या अपि तावत्य एव । सोभयो कल्प इत्याख्याते । तत्र सुषमसुषमा चतस्त्रः सागरोपमकोटीकोटयः । तवादी मनुष्या उत्तरकुरुमनुष्यतुल्याः। ततः क्रमेण हानौ सत्यां सुषमा भवति तिस्रः सागरोपमकोटीकोटयः । तदादौ मनुष्या हरिवर्षमनुष्यसमाः । ततः क्रमेण हानौ सत्यां सुषमदुष्षमा भवति द्वे सागरोपमकोटीकोट चौ । तदादी मनुष्या हैमवतकमनुष्यसमाः । ततः क्रमेण हानी सत्यां दुष्षमसुषमा भवति एकसागरोपमकोटीकोटी द्विचत्वारिंशद्वर्षसहस्रोना । तदादौ मनुष्या विदेहजनतुल्या भवन्ति । ततः क्रमेण हानौ सत्यां दुष्षमा भवति एकोवंशतिवर्षसहस्राणि । ततः क्रमेण हानौ सत्यावृद्धि और ह्रास होता है ? समाधान-उत्सर्पिणी और अवसर्पिणोसम्बन्धी छह समयोंको अपेक्षा । शंका-किनका छह समयोंको अपेक्षा वृद्धि और ह्रास होता है ? समाधान-भरत और ऐरावत क्षेत्रका । इसका यह मतलब नहीं कि उन क्षेत्रोंका वृद्धि और ह्रास होता है, क्योंकि ऐसा होना असम्भव है। किन्तु उन क्षेत्रोंमें रहनेवाले मनुष्योंका वृद्धि और हास होता है। अथवा, भरत रावतयोः' षष्ठी विभक्ति न होकर अधिकरणमें यह निर्देश किया है जिससे इस प्रकार अर्थ होता है कि भरत और ऐरावत क्षेत्रमें मनुष्योंको वृद्धि ओर ह्रास होता है। शंका-यह वृद्धि और हास किनिमित्तक होता है? समाधान--अनुभव, आयु ओर प्रमाण आदि निमित्तक होता है। अनुभव उपभागका कहते है, जावत रहनेक परिमाणको आयू कहते हैं और शरीरकी ऊँचाईको प्रमाण कहते हैं। इस प्रकार इत्यादि कारणोंसे का वृद्धि और ह्रास होता है। शंका-ये वृद्धि-ह्रास किस निमित्तसे होते हैं ? समाधान—ये कालके निमित्त से होते हैं। वह काल दो प्रकारका है-उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी। इनमें से प्रत्येकके छह भेद हैं। ये दोनों काल सार्थक नामवाले हैं। जिसमें मनुष्योंके अनुभव आदिकी वृद्धि होती है वह उत्सपिणी काल है और जिसमें इनका ह्रास होता है वह अवसर्पिणी है । अवसर्पिणीके छह भद हैं-सुषमसुषमा, सुषमा, सुषमदुष्षमा, दुष्षमसुषमा, दुष्षमा और अतिदुष्षमा । इसीप्रकार उत्सर्पिणी भी अतिदुष्षमासे लेकर सुषमसुषमा तक छह प्रकार का है। अवसर्पिणी कालका परिमाण दस कोड़ाकोड़ी सागरोपम है और उत्सर्पिणोका भी इतना ही है । ये दोनों मिलकर एक कल्पकाल कहे जाते हैं । इनमें से सुषमसुषमा चार कोडाकोड़ी सागरोपम प्रमाण है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य उत्तरकुरुके मनुष्योंके समान होते हैं। फिर क्रमसे हानि होनेपर तीन कोड़ाकोड़ो सागरोपम प्रमाण सुषमा काल प्राप्त होता है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य हरिवर्ष के मनुष्योंके समान होते हैं । तदनन्तर क्रमसे हानि होनेपर दो कोडाकोड़ो सागरोपम प्रमाण सुषमदुषमा काल प्राप्त होता है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य हैमवतके मनुष्योंके समान होते हैं। तदनन्तर क्रमसे हानि होकर ब्यालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ो सागरोपम प्रमाण दुष्षमसुषमा काल प्राप्त होता है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य विदेह क्षेत्रके मनुष्योंके समान होते हैं । तदनन्तर क्रमसे हानि होकर इक्कीस 1. -परिमाणम्, शरी - म । 2. भवतः तयोः । किंतु- ता., ना. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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