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________________ 164] सर्वार्थसिद्धौ -3123 § 412] सोतोबा । केसरिहवप्रभवा अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता सीता । उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता नरकान्ता । महापुण्डरीकवप्रभवा दक्षिणतोरणद्वारनिर्गता नारी । उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता रूप्यकूला ।. पुण्डरीक हबप्रभवा अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता सुवर्णकूला । पूर्वतोरणद्वारनिर्गता रक्ता । प्रतीव्यतोरण द्वारनिर्गता रक्तोदा । 8409. तासां परिवारप्रतिपादनार्थमाह चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृत्ता गंगासिन्धवादयो नद्यः ॥ 23 ॥ 8410. किमर्थं 'गङ्गासिन्ध्वादि ग्रहणं क्रियते ? नदीप्रहणार्थम् । प्रकृतास्ता अभिसंबध्यन्ते ? नैवं शंक्यम्; अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा' इति अपरगाणामेव ग्रहणं स्यात् । गङ्गादिग्रहणमेवास्तीति चेत् ? पूर्वगाणामेव ग्रहणं स्यात् । अत उभयीनां ग्रहणार्थं 'गङ्गासिन्ध्यादि' ग्रहणं क्रियते । 'नदी' ग्रहणं द्विगुणा हिगुणा इत्यभिसंबन्धार्थम् । गङ्गा चतुर्दशनवीसहापरिवृता । सिन्धुरपि । एवमुत्तरा अपि नद्यः प्रतिक्षेत्रं तद्द्द्विगुणद्विगुणा' भवन्ति; आ विदेहान्तात् । तत उतरा अर्द्धहीनाः । $ 411. उक्तानां क्षेत्राणां विष्कम्भप्रतिपत्त्यर्थमाह भरतः षड्विंशपञ्चयोजनशत विस्तारः षट् चैकोनविंशतिभागा योजनस्य ॥24॥ $ 412. षडधिका विंशतिः षड्विंशतिः । षविशतिरधिका' येषु तानि षड्वशानि । निकली हुई सीता नदी है तथा उत्तर तोरणद्वारसे निकली हुई नरकान्ता नदी है । महापुण्डरीक तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई नारी नदी है । तथा उत्तर तोरणद्वारसे निकली हुई रूप्यकूला नदी है। पुण्डरीक तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई सुवर्णकूला नदी है। पूर्व तोरणद्वारसे निकली हुई रक्ता नदी है और पश्चिम तोरणद्वारसे निकली हुई रक्तोदा नदी है । 8409. अब इनकी परिवार नदियोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैंगंगा और सिन्धु आदि नदियोंकी चौदह-चौदह हजार परिवार नदियाँ हैं ॥23॥ 8410. शंका - गंगा सिन्धु आदि पदका ग्रहण किसलिए किया है ? समाधान-नदियों का ग्रहण करनेके लिए। शंका-उनका तो प्रकरण है ही, अतः 'गंगासिन्ध्वादि' पदके बिना ग्रहण किये ही उनका सम्बन्ध हो जाता है ? समाधान - ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'अनन्तरका विधान होता है या प्रतिषेध' इस नियमके अनुसार पश्चिम की ओर बहनेवाली नदियोंका ही ग्रहण होता जो कि इष्ट नहीं, अतः सूत्रमें 'गंगासिन्ध्वादि' पद दिया है । शंकातो सूत्र में 'गंगादि' इतने पद का ही ग्रहण रहे ? समाधान - यदि 'गंगादि' इतने पदका ही ग्रहण किया जाये तो पूर्व की ओर बहनेवाली नदियोंका ही ग्रहण होवे जो भी इष्ट नहीं, अतः दोनों प्रकारकी नदियोंका ग्रहण करनेके लिए 'गंगासिन्ध्वादि' पदका ग्रहण किया है । यद्यपि - 'गंगासिन्ध्वादि' इतने पदके ग्रहण करनेसे ही यह बोध हो जाता है कि ये नदियाँ हैं, फिर भी सूत्र में जो 'नदी' पदका ग्रहण किया है वह 'द्विगुणा द्विगुणा:' इसके सम्बन्धके लिए किया है । गंगाकी परिवार नदियाँ चौदह हजार । इसी प्रकार सिन्धुकी भी परिवार नदियाँ चौदह हजार हैं । इस प्रकार आगेकी परिवार नदियाँ विदेह पर्यन्त दूनी दूनी होती गयी हैं। और इससे आगेकी परिवार नदियाँ आधी-आधी होती गयी हैं । $ 411. अब उक्त क्षेत्रोंके विस्तारका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैंभरत क्षेत्रका विस्तार पांच सौ छब्बीस सही छह बटे उन्नीस योजन है ॥25॥ $ 412. यहाँ टीकामें 'पहले षड्विंशपंचयोजनशतविस्तारः' पदका समास किया गया 1. अपरतोरण- मु. 1 2. पा. म. भा., पृ. 335 3. क्षेत्र द्विगुणा द्विगुणा मु. 14. -रधिकानि येषु मु. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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