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________________ 154] सर्वार्थसिद्धौ [314 8372 हेतूनुत्पादयाम इति दुःखहेतूनेवोत्पादयन्ति । त एते भावा अधोऽधोऽशुतरा वेदितव्याः। 6372. क्रिमेतेषां नारकाणां शीतोष्णजनितमेव दुःखमुतान्यथापि भवतीत्यत आह परस्परोदीरितदुःखाः ॥4॥ F373. कथं परस्परोदीरितदुःखत्वम् ? नारकाः भवप्रत्ययेनाधिना मिथ्यादर्शनोदयाविभङ्गव्यपदेशभाजा च दूरादेव दुःखहेतूनवगम्योत्पन्नदुःखाः प्रत्यासत्तौ परस्परालोकनाच्च प्रज्वलितकोपाग्नयः पूर्वभवानुस्मरणाच्चातितीवानुबद्धवराश्च श्वशृगालादिवत्स्वाभिघाते प्रवर्तमानाः स्वविक्रियाकृतासिवासीपरशुभिण्डिमालशक्तितोमरकुन्तायोधनादिभिरायुधः स्वकरचरणदशनैश्च छेवनभेदनतक्षणवंशनादिभिः परस्परस्यातितीवं दुःखमुत्पादयन्ति । 8374. किमेतावानेव दुःखोत्पत्तिकारणप्रकार उतान्योऽपि कश्चिदस्तीत्यत आह संक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाश्च प्राक चतुर्थ्याः ।।5।। कर हेतुओंको ही उत्पन्न करते हैं । इस प्रकार ये भाव नीचे-नीचे अशुभतर जानने चाहिए। विशेषार्थ यहाँ टीकामें लेश्याके दो भेद करके भावलेश्या अन्तर्मुहूर्त में बदलती रहती है यह कहा है । सो इसका तात्पर्य यह है कि जहाँ जो भावलेश्या कही है उसमें परिवर्तन नहीं होता। मात्र उसमें योग और कषायके अनुसार तरतमभाव होता रहता है; क्योंकि प्रत्येक नारकीके वही योग और वही कषाय रहनी चाहिए ऐसा नियम नहीं है। किन्तु अपने-अपने जंघन्य, मध्यम या उत्कृष्ट कालके अनुसार या द्रव्य, क्षेत्र और भावके अनुसार योग और कषायका परिवर्तन नियमसे होता है । यतः कषायानुरंजित योगप्रवृत्तिका नाम लेश्या है अत: योग और कषायके बदलनेसे अपनी मर्यादा के भीतर वह भी बदल जाती है । मात्र जहाँ कापोत लेश्याका जघन्य अंश कहा है वहाँ वही रहता है वह बदलकर कापोत लेश्याका मध्यम और 'उत्कृष्ट अंश नहीं होता या जहाँ परम कृष्ण लेश्या कही है वहाँ वही रहती है वह बदल कर अन्य लेश्या नहीं होती। शेष कथन सुगम है। ६372. क्या इन नारकियोंके शीतोष्णजनित ही दुःख है या दूसरे प्रकारका भी दुःख है, इस बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं तथा वे परस्पर उत्पन्न किये गये दुःखवाले होते हैं ॥4॥ 8373. शंका नारकी परस्पर एक-दूसरेको कैसे दुःख उत्पन्न करते हैं ? समाधाननारकियोंके भवप्रत्यय अवधिज्ञान है जिसे मिथ्यादर्शनके उदयसे विभंगज्ञान कहते हैं । इस ज्ञानके कारण दूरसे ही दुःखके कारणोंको जानकर उनको दुःख उत्पन्न हो जाता है और समीपमें आनेपर एक-दूसरेको देखनेसे उनकी क्रोधाग्नि भभक उठती है । तथा पूर्वभवका स्मरण होनेसे उनकी वैरकी गाँठ और दृढ़तर हो जाती है। जिससे वे कुत्ता और गीदड़के समान एक-दूसरे का घात करनेके लिए प्रवृत्त होते हैं । वे अपनी विक्रियासे तलवार, बसूला, फरसा, हाथसे चलानेका तीर, बी, तोमर नामका अस्त्र विशेष, बरछा और हथौड़ा आदि अस्त्र-शस्त्र बनाकर उनसे तथा अपने हाथ, पांव और दाँतोंसे छेदना, भेदना, छोलना और काटना आदिके द्वारा परस्पर अतितीव्र दुःखको उत्पन्न करते हैं। 5374. जिन कारणोंसे दुःख उत्पन्न होता है वे क्या इतने ही हैं या और भी हैं ? अब इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं और चौथी भूमिसे पहले तक वे संक्लिष्ट असुरोंके द्वारा उत्पन्न किये गये दुःखवाले भी होते हैं ।।5। 1. नारकाणम् ? भव- मु., ता; ना. । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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