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________________ - 2149 8358] द्वितीयोऽध्यायः [145 6355. 'अपि'शब्देन लब्धिप्रत्ययमभिसंबध्यते । तैजसमपि लब्धिप्रत्ययं भवतीति । $ 356. वैक्रियिकानन्तरं यदुपदिष्टं तस्य स्वरूपनिर्धारणार्थ स्वामिनिर्देशार्थ चाह शुभं विशुद्ध मव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव ॥49॥ 8357. शुभकारणत्वाच्छुभव्यपदेशः। शुभकर्मण आहारककाययोगस्य कारणत्वाच्छुभमित्युच्यते अन्नस्य प्राणव्यपदेशवत् । विशुद्धकार्यत्वाद्विशुद्धव्यपदेशः। विशुद्धस्य 'पुण्यकर्मणः अशबलस्य निरवद्यस्य कार्यत्वाद्विशुद्धमित्युच्यते तन्तूनां कार्पासव्यपदेशवत् । उभयतो व्याघाताभावादव्याघाति । न ह्याहारकशरीरेणान्यस्य व्याघातः । नाप्यन्ये नाहारकस्येति । तस्य प्रयोजनसमुच्यार्थः 'च'शब्दः क्रियते । तद्यया-कदाचिल्लब्धिविशेषसद्भावज्ञापनार्थ कदाचित्सूक्ष्मपदार्थनिर्धारणार्थ संयमपरिपालनार्थं च । आहारकमिति प्रागुक्तस्य प्रत्याम्नायः। यदाहारकशरीरं निर्वर्तयितुमारभते तदा प्रमत्तो भवतीति 'प्रमत्तसंयतस्य' इत्युच्यते । इष्टतोऽवधारणार्थ 'एवं'कारोपादानम् । यथैवं विज्ञायेत प्रमत्तसंयतस्यैवाहारकं नान्यस्येति । मैवं विज्ञायि प्रमत्तसंयतस्थाहारकमेवेति । मा भूदौदारिकादिनिवृत्तिरिति। $ 358. एवं विभक्तानि शरीराणि बिभ्रता संसारिणां प्रतिगति किं त्रिलिङ्गसंनिधानं $355. सूत्रमें 'अपि' शब्द आया है। उससे 'लब्धिप्रत्ययम्' पदका ग्रहण होता है। तेजस शरीर भी लब्धिप्रत्यय होता है यह इस सूत्रका भाव है। 6356. वैक्रियिक शरीरके पश्चात् जिस शरीरका उपदेश दिया है उसके स्वरूपका निश्चय करनेके लिए और उसके स्वामीका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं आहारक शरीर शुभ, विशुद्ध और व्याघात रहित है और वह प्रमत्तसंयतके ही होता है ॥४९॥ 8357. शुभकर्मका कारण होनेसे इसे शुभ कहा है। यह शरीर आहारक काययोगरूप शभकर्मका कारण है, इसलिए आहारक शरीर शभ कहलाता है। यहाँ कारणमें कार्यका उपचार है। जैसे अन्नमें प्राणका उपचार करके अन्नको प्राण कहते हैं । विशुद्ध कर्मका कार्य होनेसे आहारक शरीरको विशुद्ध कहा है। तात्पर्य यह है कि जो चित्र-विचित्र न होकर निर्दोष है ऐसे विशुद्ध अर्थात् पुण्यकर्मका कार्य होनेसे आहारक शरीरको विशुद्ध कहते हैं । यहाँ कार्य में कारणका उपचार है। जैसे तन्तुओंमें कपासका उपचार करके तन्तुओं को कपास कहते हैं। दोनों ओरसे व्याघात नहीं होता, इसलिए यह अव्याघाती है । तात्पर्य यह है कि आहारक शरीरसे अन्य पदार्थका व्याघात नहीं होता और अन्य पदार्थसे आहारक शरीरका व्याघात नहीं होता। आहारक शरीरके प्रयोजनका समुच्चय करनेके लिए सूत्रमें 'च' शब्द दिया है। यथा-आहारक शरोर कदाचित लब्धि-विशेषके सद्भावको जतानेके लिए, कदाचित् सूक्ष्म पदार्थका निश्चय करने के लिए और संयमकी रक्षा करनेके लिए उत्पन्न होता है । सूत्रमें 'आहारक' पद आया है उससे पूर्व में कहे गये आहारक शरीरको दुहराया है । जिस समय जीव आहारक शरीरकी रचनाका आरम्भ करता है उस समय वह प्रमत्त हो जाता है, इसलिए सूत्र में प्रमत्तसंयतके ही आहारक शरीर होता है यह कहा है । इष्ट अर्थ के निश्चय करने के लिए सूत्रमें 'एवकार' पदको ग्रहण किया है। जिससे यह जाना जाय कि आहारक शरीर प्रमत्तसंयतके ही होता है अन्यके नहीं। किन्तु यह न जाना जाय कि प्रमत्तसंयतके आहारक ही होता है । तात्पर्य यह है कि प्रमत्तसंयतके औदारिक आदि शरीरोंका निराकरण न हो, इसलिए प्रमत्तसंयत पदके साथ ही एवकार पद लगाया है। 8358. इस प्रकार इन शरीरोंको धारण करनेवाले संसारो जीवोंके प्रत्येक गतिमें क्या 1. पुण्यस्य कर्मणः मु.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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