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________________ -~-217 8 268] द्वितीयोऽध्यायः [115 सा षड्विधा-कृष्णलेश्या नीललेश्या कापोतलेश्या तेजोलेश्या पद्मलेश्या शुक्ललेश्या चेति । 8266. ननु च उपशान्तकषाये क्षीणकषाये सयोगकेवलिनि च शक्ललेश्यास्तीत्यागमः। तत्र कायानुरजनाभावादोदयिकत्वं नोपपद्यते। नैष दोष; पूर्वभावप्रज्ञापननया पेक्षया यासौ योगप्रवृत्तिः कषायानुरञ्जिता सैवेत्युपचारादौदयिकोत्युच्यते । तदभावादयोगकेवल्यलेश्य इति निश्चीयते। $ 267. यः पारिणामिको भावस्त्रिभेद उक्तस्तभेदस्वरूपप्रतिपादनार्थमाह जीवभव्याभव्यत्वानि च ॥7॥ 8268. जीवत्वं भव्यत्वमभव्यत्वमिति त्रयो भावाः पारिणामिका अन्यद्रव्यासाधारणा आत्मनो वेदितव्याः । कतः पुनरेषां पारिणामिकत्वम् । कर्मोदयोपशमक्षयक्षयोपशमानपेक्षित्वात । जोलत्वं दैतन्यमित्यर्थः । सम्यग्दर्शनादिभावेन भविष्यतीति भव्यः । तद्विपरोतोऽभव्यः। त एते उदयसे अनुरंजित योगकी प्रवृत्तिरूप है, इसलिए वह औदयिक है ऐसा कहा जाता है। वह व्ह प्रकारको है-कृष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या, पीतलेश्या, पदमलेश्या और शुक्ललेश्या। $ 266. शंका-उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय और सयोगकेवली गुणस्थानमें शुक्ललेश्या है ऐसा आगम है, परन्तु वहाँपर कषायका उदय नहीं है इसलिए औदयिकपना नहीं बन सकता। समाधान - यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि जो योगप्रवृत्ति कषायोंके उदयसे अनुरंजित होती रही वह यह है इस प्रकार पूर्वभावप्रज्ञापन नयकी अपेक्षा उपशान्तकषाय आदि गुणस्थानोंमें भी लश्याको औदयिक कहा गया है। किन्तु अयोगकेवलीके योगप्रवृत्ति नहीं होती, इसलिए वे लेश्यारहित हैं ऐसा निश्चय होता है। विशेषार्थ-कर्मोको जातियाँ और उनके अवान्तर भेद अनेक हैं, इसलिए उनके उदयसे होने वाले भाव भो अनेक हैं, पर यहाँ मुख्य-मुख्य औदयिक भाव ही गिनाये गये हैं। ऐसे भाव इक्कोस होते हैं। प्रथम चार भेद चार गति हैं । ये गति-नामकर्म के उदयसे होते हैं। नामकर्म अघातिकर्म है। गति-नामकर्म उसीका एक भेद है। जो प्रकृतमें अन्य जीवविपाकी अघाति कर्मोंका उपलक्षण है। पूदगलविपाकी कर्मोके उदयसे जीवभाव नहीं होते, अत: उनकी यहाँपरिगणना नहीं की गयी है । धाति कर्मोम क्रोधादि चारों कषायोंके उदयसे क्रोधादि चार भाव हैं तीन वेदोंके उदयसे तीन लिंग होते हैं। तीन वेद उपलक्षण हैं। इनसे हास्य आदि छह भावोंका भो ग्रहण होता है । दर्शनमोहनोयके उदयसे मिथ्यादर्शन होता है। दर्शनावरणके उदयसे होनेवाले अदर्शनभावोंका इसी में ग्रहण होता है । ज्ञानावरगके उदयसे अज्ञानभाव होता है, असंयत भाव चारित्रमोहनीयके उदयका कार्य है और असिद्ध भाव सब कर्मोके उदयका कार्य है। रहीं लेश्याएँ सो ये कषाय और योग इनके मिलनेसे उत्पन्न हई परिणति विशेष हैं। फिर भी इनमें कर्मोदयको मख्यता होनेसे इनकी औदयिक भावोंमें परिगणना की गयी है। इन भावोंमें कर्मोका उदय निमित्त है, इसलिए इन्हें औदयिक कहते हैं। 8 267. अब जो तीन प्रकारका पारिणामिक भाव कहा है उसके भेदोंके स्वरूपका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं पारिणामिक भावके तीन भेद हैं-जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व ॥7॥ 8268. जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व ये तीन पारिणामिक भाव अन्य द्रव्योंमें नहीं होते इसलिए ये आत्माके जानने चाहिए। शंका-ये पारिणामिक क्यों हैं? समाधान-ये तीनों भाव कर्मके उदय, उपशम, क्षय और क्षयोपशमके बिना होते हैं, इसलिए पारिणामिक हैं। जीवत्वका 1.-पनापेक्ष आ., दि. 1, दि. 2 । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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