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________________ - 215 8 263] प्रथमोऽध्यायः [113 क्षयात्तेषामेव सदुपशमाद्देशघातिस्पर्द्धकानामुदये क्षायोपशमिको भावो भवति । तत्र ज्ञानादीनां वृत्तिः स्वावरणान्तरायक्षयोपशमाद् व्याख्यातव्या। 'सम्यक्त्व'ग्रहणेन वेदकसम्यक्त्वं गृह्यते । अनन्तानुबन्धिकषायचतुष्टयस्य मिथ्यात्वसम्यमिथ्यात्वयोश्चोदयक्षयात्सदुपशमाच्च सम्यक्त्वस्य देशघातिस्पर्द्धकस्योदये तत्त्वार्थश्रद्धानं क्षायोपशमिकं सम्क्क्त्व म् । अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानद्वादशकषायोदयक्षयात्सदुपशमाच्च संज्वलनकषायचतुष्टयान्यतमदेशघातिस्पर्द्धकोदये नोकषायनवकस्य यथासंभवोदये च निवृत्तिपरिणाम आत्मनः क्षायोपशमिकं चारित्रम् । अनन्तानुजयप्रत्याख्यानकषायाष्टकोदक्षयात्सदपशमाच्च प्रत्याख्यानकषायोदये संज्वलनकषायस्य देशघातिस्पर्द्धकोदये नोकषायनवकस्य यथासंभवोदये च विरताविरतपरिणामः क्षायोपशमिकः संयमासंयम इत्याख्यायते। लब्धियाँ । वर्तमान कालमें सर्वघाती स्पर्द्ध कोंका उदयाभावी क्षय होनेसे और आगामी कालकी अपेक्षा उन्हींका सदवस्था रूप उपशम होनेसे देशघाती स्पर्द्ध कोंका उदय रहते हुए क्षायोपशमिक भाव होता है । इन पूर्वोक्त भावोंमें-से ज्ञान आदि भाव अपने-अपने आवरण और अन्तराय कर्मके क्षयोपशमसे होते हैं ऐसा व्याख्यान यहाँ कर लेना चाहिए। सूत्रमें आये हए सम्यक्त्वपदसे वेदक सम्यक्त्व लेना चाहिए । तात्पर्य यह है कि चार अनन्तानुबन्धी कषाय, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन छह प्रकृतियों के उदयाभावी क्षय और सदवस्थारूप उपशमसे देशघाती स्पर्धकवाली सम्यक्त्व प्रकृतिके उदयमें जो तत्त्वार्थधद्धान होता है वह क्षायोपशमिक सम्यक्त्व है। अनन्तानबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण इन बारह कषायोंके उदयाभावी क्षय होनेसे और इन्हीके सदवस्थारूप उपशम होनेसे तथा चार संज्वलनोंमें-से किसी एक देशप्राती प्रकतिके उदय होनेपर और नौ नोकषायोंका यथासम्भव उदय होनेपर जो संसारसे परी निवत्तिरूप परिणाम होता है वह क्षायोपशमिक चारित्र है । अनन्तानुबन्धी और अप्रत्याख्यानावरण इन आठ कषायोंके उदयाभावी क्षय होनेसे और सदवस्थारूप उपशम होनेसे तथा प्रत्याख्यानावरण कषायके और संज्वलन कषायके देशघाती स्पर्द्ध कोंके उदय होनेपर तथा नौ नोकषायोंके यथासम्भव उदय होनेपर जो विरताविरतरूप परिणाम होता हैं वह संयमासंयम कहलाता हैं। विशेषार्थ-वर्तमान समयमें सर्वघाति स्पर्धकोंका उदयाभावी क्षय, आगामी कालकी अपेक्षा उन्हींका सदवस्थारूप उपशम और देशघाति स्पर्धकोंका उदय यह क्षयोपशमका लक्षण है। यह तो सुनिश्चित है कि अधिकतर देशघाति कर्म ऐसे होते हैं जिनमें देशघाति और सर्वघाति दोनों प्रकारके स्पर्धक पाये जाते हैं। केवल नौ नोकषाय और सम्यक प्रकृति ये दस प्रकृतियाँ इसकी अपवाद हैं। इनमें मात्र देशघाति स्पर्धक ही पाये जाते हैं, अत: नौ नोकषायोंके सिवा शेष सब देशघाति कर्मोका क्षयोपशम सम्भव है, क्योंकि पूर्वोक्त लक्षणके अनुसार क्षयोपशममें दोनों प्रकारकी शक्तिवाले कर्म लगते हैं। सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व व सभ्यग्मिथ्यात्वसे मिलकर क्षायोपशमिक भावको जन्म देनेमें निमित्त होती है, इसलिए क्षायोपशमिक भावके कुल अठारह भेद ही घटित होते हैं। उदाहरणार्थ-ज्ञानावरणकी देशघाति प्रकृतियाँ चार हैं, अतः इनके क्षयोपशमसे चार ज्ञान प्रकट होते हैं, पर मिथ्यादष्टिके तीन अज्ञान और सम्यग्दृष्टिके चार ज्ञान इस प्रकार क्षायोपशमिक ज्ञानके कुल भेद सात होते हैं। इसीसे अठारह क्षायोपशमिक भावोंमें इन सात ज्ञानोंकी परिगणना की जाती है। प्रकृतमें दर्शन तीन और लब्धि पाँच क्षायोपशमिक भाव हैं यह स्पष्ट ही है। शेष रहे तीन भाव सो ये वेदक सम्यक्त्व, संयमासंयम और संयम लिये गये हैं। इन सब भावोंमें देशघाति स्पर्धकोंका उदय होता है, इसलिए इन्हें वेदक भाव भी कहते हैं। जितने भी क्षायोपशमिक भाव होते हैं वे देशघाति स्पर्धकोंके उदयसे वेदक भी कहलाते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है । इसमें सर्वघाति स्पर्धकों या सर्वघाति प्रकृतियोंका Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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