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________________ 96] सर्वार्थसिद्धी [11288 2288 228. यदेतद्रूपि' द्रव्यं सर्वावधिज्ञानविषयत्वेन समथितं तस्यानन्तभागीकृतस्यैकस्मिभागे मनःपर्ययः प्रवर्तते। 8 229. अथान्ते यन्निर्दिष्टं केवलज्ञानं तस्य को विषयनिबन्ध इत्यत आह सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य ॥29॥ 230. द्रव्याणि च पर्यायाश्च द्रव्य पर्याया इति इतरेतरयोगलक्षणो द्वन्द्वः । तद्विशेषणं 'सर्व' ग्रहणं प्रत्येकमभिसंबध्यते, सर्वेषु द्रव्येषु सर्वेषु पर्यायेष्विति। जीवद्रव्याणि तावदनन्तानन्तानि ततोऽप्यनन्तानन्तानि पुद्गलद्रव्याणि च अणुस्कन्धभेदभिन्नानि, धर्माधर्माकाशानि श्रीणि, कालश्चासंख्येयस्तेषां पर्यायाश्च त्रिकालभुवः प्रत्येकमनन्तानन्तास्तेषु । द्रव्यं पर्यायजातं वा न किंचित्केवलज्ञानस्य विषयभावमतिकान्तमस्ति । अपरिमितमाहात्म्यं हि तदिति ज्ञापनार्थ 'सर्वद्रव्यपर्यायेषु' इत्युच्यते । 8 231. आह विषयनिबन्धोऽवधृतो मत्यादीनाम् । इदं तु न नितिमेकस्मिन्नात्मनि स्वनिमित्तसंनिधानोपजनितवृत्तीनि ज्ञानानि यौगपद्येन कति भवन्तीत्युच्यते 8 228. जो रूपी द्रव्य सर्वावधिज्ञानका विषय है उसके अनन्त भाग करनेपर उसके एक भागमें मनःपर्ययज्ञान प्रवृत्त होता है। 8 229. अब अन्तमें जो केवलज्ञान कहा है उसका विषय क्या है यह बतलानेके लिए आगे का सूत्र कहते हैं केवलज्ञानकी प्रवृत्ति सब द्रव्य और उनकी सब पर्यायोंमें होती है ॥29॥ 6230. सत्रमें आये हए द्रव्य और पर्याय इन दोनों पदोंका इतरेतरयोग द्वन्द्वसमास है। तथा इन दोनोंके विशेषरूपसे आये हुए 'सर्व' पदको द्रव्य और पर्याय इन दोनोंके साथ जोड लेना चाहिए। यथा-सब द्रव्योंमें और सब पर्यायोंमें । जीव द्रव्य अनन्तानन्त हैं। पूदगल द्रव्य इनसे भी अनन्तानन्तगणे हैं। जिनके अणु और स्कन्ध ये भेद हैं । धर्म, अधर्म और आकाश ये तीन हैं और काल असंख्यात हैं। इन सब द्रव्योंकी पृथक-पृथक् तीनों कालोंमें होनेवालो अनन्तानन्त पर्यायें हैं। इन सबमें केवलज्ञानकी प्रवृत्ति होती है । ऐसा न कोई द्रव्य है और न पर्यायसमूह है जो केवलज्ञानके विषयके परे हो । केवलज्ञानका माहात्म्य अपरिमित है इसी बातका ज्ञान कराने के लिए सूत्र में 'सर्वद्रव्यपर्यायेषु' पद कहा है। विशेषार्थ-यहाँ चार सूत्रोंमें पाँचों ज्ञानोंके विषयका निर्देश किया गया है। मतिज्ञान और श्रुतज्ञान पाँचों इन्द्रियों और मनकी सहायतासे प्रवृत्त होते हैं यह तो स्पष्ट ही है, इसलिए इनका विषय मतिक पदार्थ ही हो सकता है। पर मन विकल्प-द्वारा रूपी और अरूपी सभी पदार्थोको जानता है, इसीसे इन दोनों ज्ञानोंका विषय छहों द्रव्य और उनकी कुछ पर्यायोंको बतलाया है। अवधिज्ञान यद्यपि बाह्य सहायताके बिना प्रवृत्त होता है, पर वह क्षायोपशमिक होनेसे उसका विषय मूर्तिक पदार्थ ही हो सकता है। इसी कारणसे अवधिज्ञानका विषय रूपी पदार्थ कहा है । मनःपर्ययज्ञान भी क्षायोपशमिक होता है, इसलिए उसका विषय यद्यपि रूपी पदार्थ ही है, पर यह रूपी पदार्थको मनकी पर्यायों द्वारा ही ग्रहण करता है, इससे इसका विषय अवधिज्ञानके विषयके अनन्तवें भागप्रमाण कहा है तथा केवलज्ञान निरावरण होता है, इसलिए उसका विषय सब द्रव्य और उनकी सब पर्यायें हैं ऐसा कहा है। 8231. मत्यादिकके विषयसम्बन्धका निश्चय किया, किन्तु यह न जान सके कि एक 1. यदूपि-दि. 1, दि. 21 2. भेदेन भि -मु. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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