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________________ 179 -1158190] प्रथमोऽध्यायः 8189. एवं निर्जातोत्पत्तिनिमित्तमनिर्णीतभेदमिति तद्भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह अवग्रहेहावायधारणाः ॥15॥ 8 190. विषयविषयिसंनिपातसमनन्तरमाद्य ग्रहणमवग्रहः । विषयविषयिसंनिपाते सति वर्शनं भवति । तदनन्तरमथग्रहणमवग्रहः । यथा-चक्षुषा शुक्लं रूपमिति ग्रहणमवग्रहः । अबमहगृहीतेऽर्थे तद्विशेषाकाङ्क्षणमोहा । यथा शुक्लं रूपं कि वलाका पताका वेति । विशेषनिर्जामाद्याथात्म्यावगमनमवायः । उत्पतननिपतनपक्षविक्षेपादिभिर्वलाकवयं न पताकेति। अवतस्य कालान्तरेऽविस्मरणकारणं धारणा । यथा. सैवेयं वलाका पूर्वाहणे यामहमद्रासमिति । एषामवहादीनामुपन्यासक्रम उत्पतिक्रमकृतः । पदार्थको विषय करनेवाला और कालान्तर में अवस्थित नहीं रहनेवाला बतलाया है सो इसका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार इन्द्रियाँ देश और काल दोनोंकी अपेक्षा नियत विषयको ग्रहण , करती हैं वैसा मन नहीं है। इस प्रकार मनका विषय नियत नहीं है। उसकी इन्द्रियगम्य और । अतीन्द्रिय सब विषयों में प्रवृत्ति होती है। इसका दूसरा नाम अन्तःकरण क्यों है इसका स्पष्टार्थ टीकामें किया ही है । शेष कथन सुगम है। 189. इस प्रकार मतिज्ञानकी उत्पत्तिके निमित्त जान लिये, किन्तु अभी उसके भेदोंका निणय नहीं किया अतः उसके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए अगला सूत्र कहते हैं अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये मतिज्ञानके चार भेद है ॥15॥ $190 विषय और विषयीके सम्बन्धके बाद होनेवाले प्रथम ग्रहणको अवग्रह कहते हैं। विषय और विषयीका सन्निपात होनेपर दर्शन होता है उसके पश्चात् जो पदार्थका ग्रहण होता है वह अवग्रह कहलाता है। जैसे चक्षु इन्द्रियके द्वारा 'यह शुक्ल रूप हैं। ऐसा ग्रहण करना अवग्रह है। अवग्रहके द्वारा ग्रहण किये गये पदार्थों में उसके विशेषके जानने की इच्छा ईहा कह. लाती है । जैसे, जो शुक्ल रूप देखा है 'वह क्या वकपंक्ति है' इस प्रकार विशेष जाननेको इच्छा या 'वह क्या पताका है' इस प्रकार विशेष जाननेकी इच्छा ईहा है। विशेषके निर्णय-द्वारा जो यथार्थ ज्ञान होता है उसे अवाय कहते हैं । जैसे उत्पतन, निपतन और पक्षविक्षेप आदि के द्वारा 'मह वकपंक्ति ही है ध्वजा नहीं है' ऐसां निश्चय होना अवाय है। जानी हुई वस्तु का जिस कारण कालान्तरमें विस्मरण नहीं होता उसे धारणा कहते हैं। जैसे यह वही वकपंक्ति है जिसे प्रात.काल मैंने देखा था ऐसा जानना धारणा है। सूत्रमें इन अवग्रहादिकका उपन्यासक्रम इनके उत्पत्तिक्रमकी अपेक्षा किया है । तात्पर्य यह है कि जिस क्रमसे ये ज्ञान उत्पन्न होते हैं उसी क्रमसे इनका सत्र में निर्देश किया है। विशेषार्थ-इस सत्रमें मतिज्ञान के चार भेद किये हैं सोये भेद मतिज्ञानकी उपयोगरूप अवस्थाकी प्रधानतासे किये गये हैं। इससे इसका क्षयोपशम भी इतने प्रकारका मान लिया गया है। पदार्थको जानते समय किस क्रमसे वह उसे जानता है यह इन भेदों-द्वारा बतलाया गया है यह इस कथनका तात्पर्य है । भेदके स्वरूपका निर्देश टीकामें किया ही है। विशेष वक्तव्य इतना 1.-माद्य ग्रह-मु.। 2.-मर्थस्य ग्रह-मु.। 3. पताकेति-मु.। 4. उत्पतनपक्ष-आ., दि. 1, दि. 21 5. अर्थतस्य–मु.। 6. 'तयणंतरं तयथाविच्चवणं जो य वासणाजोगो। कालंतरे य जं पुणरणुसरणं धारणा साउ।'-वि. भा. गा. 291। 7. ईहिज्जइ नागहियं नज्जइ नाणीहियं न यावायं । धारिज्जइ जं वत्थं लेण कमोऽवग्गहाईप्रो'वि. मा. गा. 2961 . Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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