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________________ --118898] प्रथमोऽध्यायः 143 प्रमतसयोगकेवलिनां नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तः । सासादनसम्यग्दृष्टः . सामान्योक्तः कालः सम्यमिथ्यादृष्टे नाजीवापेक्षया जघन्येनैकसमयः । उत्कर्षेण पल्योपमासंख्येयभागः । एकजीवं प्रति जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेपान्तर्मुहूर्तः । चतुर्णामुपशमकानां क्षपकाणां च नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च जघन्येनैकसमयः । उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तः । काययोगिषु मिथ्यादृष्ट नाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं प्रति जघन्येनंकसमयः । उत्कर्षेणानन्तः कालोऽसंख्येयाः पुद्गलपरिवर्ताः । शेषाणां मनोयोगिवत् । अयोगानां सामान्यवत् । 98. वेदानुवादेन स्त्रीवेदेषु मिश्यादृष्टे नाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण पल्पोपमशतपृथक्त्वम् । सासादनसम्यग्दृष्टभानिवृत्तिबादरान्तानां सामान्योक्तः कालः । किन्तु असंयतसम्यग्दृष्टे नाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं प्रति जघन्येनानन्तर्मुहूर्तः। उत्कर्षेण पञ्चपञ्चाशत्पल्योपमानि देशोनानि । पुवेदेषु मिथ्यादृष्टानाजीवापेक्षवा सर्वः कालः । एकजीवं प्रति जवन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण सागरोयमशतपृथक्त्वम् । सासादनसम्यग्दृष्टयाद्यनिवृत्तिबादरान्तानां सामान्योक्तः कालः। नपुंसकवेदेषु मिथ्यादृष्टे नाजीवासम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत और सयोगकेवलियोंका नाना जीवोंको अपेक्षा सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्महर्त है। सासादनसम्यग्दष्टिका सामान्योक्त काल है। सम्यग्मिथ्याष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल पल्योपमका असंख्यातवाँ भाग है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तमुहर्त है। चारों उपशमक और चारों क्षपकोंका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। काययोगियोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट अनन्त काल है जिसका प्रमाण असंख्यात पुद्गल परिवर्तन है। शेषका काल मनोयोगियोंके समान है। तथा अयोगियोंका काल ओघके समान है। 898. वेद मार्गणाके अनुवादसे स्त्रीवेदवालोंमें मिथ्यादष्टिका नाना जीवकी अपेक्षा सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तमुहर्त है और उत्कृष्ट काल सौपल्योपम पथक्त्व है । सासादन सम्यग्दृष्टिसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक प्रत्येकका सामान्योक्त काल है। किन्तु असंयत सम्यग्दष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तम हर्त है और उत्कृष्ट काल कुछ कम 'पचपन पल्योपम है। पुरुषवेदवालोंमें मिथ्यादष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक जीवकी अपेक्षा जवन्य काल अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट काल सौ सागरोपम पथक्त्व है। तथा सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक प्रत्येक 1. मनोयोग, वचनयोग और काययोगका जघन्य काल एक समय योगपरावृत्ति, गुणपरावृत्ति, मरण और व्याघात इस तरह चार प्रकारसे बन जाता है। इनमें से मिथ्यादृष्टि, असंयत सम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और प्रमत्तसंयत यहाँ पर चारों प्रकार सम्भव हैं। अप्रमत्तसंयतके व्याघातके बिना तीन प्रकार सम्भव हैं, क्योंकि व्याघात और अप्रमत्तभावका परस्परमें विरोध है और सयोगिकेवलीके एक योगपरावृत्तिसे ही जघन्य काल एक समय प्राप्त होना सम्भव है। 2. मरणके बिना शेष तीन प्रकारसे यहाँ जघन्य काल एक समय घटित कर लेना चाहिए। 3. उपशमकोंके व्याघातके बिना तीन प्रकारसे और क्षपकोंके मरण और व्याघातके बिना दो प्रकारसे जघन्य काल एक समय प्राप्त होता है। 4. देवीकी उत्कृष्ट आयु पचपन पल्य है। इसमें से प्रारम्भका अन्तमुहूर्त काल कम कर देनेपर स्त्रीवेदमें असंयतसम्यग्दृष्टिका उत्कृष्ट काल कुछ कम पचपन पल्य प्राप्त हो जाता है। 5. तीन सौ सागरसे ऊपर और नौ सौ सागरके नीचे । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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