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________________ 22] सर्वार्थसिद्धौ [118834 - नातिसंक्षेपेण नातिविस्तरेण प्रतिपाद्याः । सर्वसत्त्वानुग्रहार्थो हि सतां प्रयास इति अधिगमाभ्युपायभेदोद्देशः कृतः । इतरथा हि "प्रमाणनयैरधिगमः" इत्यनेनैव सिद्धत्वादितरेषां ग्रहणमनर्थकं स्यात् । 834. तत्र जीवद्रव्यमधिकृत्य सदाद्यनुयोगद्वारनिरूपणं क्रियते। जीवाश्चतुर्दशसु गुणस्थानेषु व्यवस्थिताः । मिथ्यादृष्टिः सासादनसम्यग्दृष्टिः सम्यमिथ्यादृष्टिः असंयतसम्यग्दृष्टिः संयतासंयतः प्रमत्तसंयतः अप्रमत्तसंयतः अपूर्वकरणस्थाने उपशमकः क्षपकः अनिवृत्तिबादरसांपरायस्थाने उपशमकः क्षपकः सुक्ष्मसांपरायस्थाने उपशमकः क्षपकः उपशान्तकषायवीतरागछदमस्थः क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थः सयोगकेवली अयोगकेवली चेति । एतेषामेव जीवसमासानां निरूपणार्थ चतुर्दश मार्गणास्थानानि ज्ञेयानि। गतीन्द्रियकाययोगवेदकषायज्ञानसंयमदर्शनलेश्याभन्यसम्यक्त्वसंज्ञाहारका इति। 35. तत्र सत्प्ररूपणा द्विविधा सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन अस्ति मिथ्यादृष्टिः सासादनसम्यग्दृष्टिरित्येवमादि । विशेषण गत्यनुवादेन नरकगतौ सर्वासु पृथिवीषु आद्यानि चत्वारि गुणस्थानानि सन्ति । तिर्यग्गतौ तान्येव संयतासंयतस्थानाधिकानि सन्ति। मनुष्यगतो चतुर्दशापि सन्ति । देवगतौ नारकवत् । इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियादिषु चतुरिन्द्रियपर्यन्तेषु एकमेव मिथ्यादृष्टिस्थानम् । पञ्चेन्द्रियेषु चतुर्दशापि सन्ति । कायानुवादेन पृथिवीकायादि वनस्पतिकायान्तेषु एकमेव मिथ्यादृष्टिस्थानम् । त्रसकायेषु चतुर्दशापि सन्ति । योगानुवादेन त्रिषु योगेषु त्रयोदश गुणस्थानानि भवन्ति । ततः परं अयोगकेवली । वेदानुवादेन त्रिषु वेदेषु मिथ्यादृष्टयाद्यनिवृत्तिविस्ताररुचिवाले होते हैं और दूसरे शिष्य न तो अतिसंक्षेप कथन करनेसे समझते हैं और न अति विस्तृत कथन करनेसे समझते हैं। किन्तु सज्जनोंका प्रयास सब जीवों का उपकार करना है, इसलिए यहाँ अलगसे ज्ञानके उपायके भेदोंका निर्देश किया है। अन्यथा 'प्रमाणनयैरधिगमः' इतनेसे ही काम चल जाता, अन्य उपायोंका ग्रहण करना निष्फल होता। $ 34. अब जीव द्रव्यकी अपेक्षा 'सत्' आदि अनुयोगद्वारोंका कथन करते हैं यथाजीव चौदह गुणस्थानोंमें स्थित हैं। मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत, अपूर्वकरण गुणस्थानवर्ती उपशमक और क्षपक, अनिवृत्तिबादरसाम्पराय गुणस्थानवर्ती उपशमक और क्षपक, सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानवर्ती उपशमक और क्षपक, उपशान्तकषाय वीतराग छद्मस्थ, क्षीणकषाय वीतराग छद्मस्थ, सयोगकेवली और अयोगकेवली। इन चौदह जीवसमासोंके निरूपण करनेके लिए चौदह मार्गणास्थान जानने चाहिए। यथा-गति, इन्द्रिय, काय, योग, बेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, भल्य, सम्यक्त्व, संज्ञा और आहारक। 35. इनमें से सामान्य और विशेषकी अपेक्षा सत्प्ररूपणा दो प्रकारको है। मिथ्यादृष्टि है, सासादन सम्यग्दृष्टि है इत्यादिरूपसे कथन करना सामान्यकी अपेक्षा सत्प्ररूपणा है। विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें सब पृथिवियोंमें प्रारम्भके चार गुणस्थान हैं। तिर्यंचगतिमें वे ही चार गुणस्थान हैं किन्तु संयतासंयत एक गुणस्थान और है। मनुष्यगतिमें चौदह ही गुणस्थान हैं और देवगतिमें नारकियोंके समान चार गुणस्थान हैं । इन्द्रिय मार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रियोंसे लेकर चौइन्द्रिय तकके जीवोंमें एक ही मिथ्यादृष्टि गुणस्थान है। पंचेन्द्रियोंमें चौदह ही गुणस्थान हैं। कायमार्गणाके अनुवादसे पृथिवीकायसे लेकर वनस्पति तकके जीवोंमें एक ही मिथ्यादृष्टि गुणस्थान है। त्रसकायिकोंमें चौदह ही गुणस्थान हैं। योग मार्गणाके अनुवादसे तीनों योगोंमें तेरह गुणस्थान हैं और इसके बाद अयोगकेवली गुणस्थान है। 1. कायादिषु वनस्प-मु. न. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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