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________________ -114 § 19] प्रथमोऽध्यायः [11 8 18. तत्र चेतनालक्षणो जीवः । सा च ज्ञानादिभेदादनेकधा भिद्यते । तद्विपर्ययलक्षणोsourceः । शुभाशुभकर्मागमद्वाररूप आस्रवः । आत्मकर्मणोरन्योऽन्यप्रदेशानुप्रवेशात्मक बन्धः । आखनिरोधलक्षणः संवरः । एकदेशकर्म संक्षयलक्षणा निर्जरा । कृत्स्नकर्म वियोगलक्षणो मोक्षः । एषां प्रपञ्च उत्तरत्र वक्ष्यते । सर्वस्य फलस्यात्माधीनत्वादादी जीवग्रहणम् । तदुपकारार्थत्वात्तवनन्तरमजीवाभिधानम् । तदुभयविषयत्वात्तदनन्तरमात्रवग्रहणम् । तत्पूर्वकत्वा तदनन्तरं बन्धाभिषानम् । संवृतस्य बन्धाभावात्तत्प्रत्यनीकप्रतिपत्यये तदनन्तरं संवरवचनम् । संवरे सति निर्जरोपपतेस्तदन्तिके निर्जरावचनम् । अन्ते प्राप्यत्वान्मोक्षस्यान्ते वचनम् । $ 19. इह पुण्यपापग्रहणं कर्त्तव्यम् । 'नव पदार्थाः' ' इत्यन्यैरप्युक्तत्वात् । न 'कर्त्तव्यम्, वे बन्धे चान्तर्भावात् । यद्येवमात्रवादिग्रहणमनर्थक, जीवाजीवयोरन्तर्भावात् । नानर्थकम् । इह मोक्षः प्रकृतः । सोऽवश्यं निर्देष्टव्यः । स च संसारपूर्वकः । संसारस्य प्रधान हेतुरात्रवो arave | मोक्षस्य प्रधानहेतुः संवरो निर्जरा च । अतः प्रधानहेतुहेतुमत्फलनिदर्शनार्थत्वात्पृथगुपदेशः कृतः । दृश्यते हि सामान्येऽन्तर्भूतस्यापि विशेषस्य पृथगुपादानं प्रयोजनार्थम् । 'क्षत्रिया आयाताः सूरजमst' इति । $ 18. इनमें से जीवका लक्षण चेतना है जो ज्ञानादिकके भेदसे अनेक प्रकारकी है। जीवसे विपरीत लक्षणवाला अजीव है। शुभ और अशुभ कर्मोके आनेके द्वार रूप आस्रव है । आत्मा और कर्मके प्रदेशोंका परस्पर मिल जाना बन्ध है । आस्रवका रोकना संबर है। कर्मोंका एकदेश अलग होना निर्जरा है और सब कर्मोंका आत्मासे अलग हो जाना मोक्ष है । इनका विस्तार से वर्णन आगे करेंगे। सब फल जीवको मिलता है, अतः सूत्रके प्रारम्भ में जीवका ग्रहण किया है। अजीव जीवका उपकारी है यह दिखलाने के लिए जीवके बाद अजीवका कथन किया है । आस्रव जीव और अजीव दोनोंको विषय करता है अतः इन दोनोंके बाद आस्रवका ग्रहण किया है । बन्ध आस्रव पूर्वक होता है, इसलिए आवके बाद बन्धका कथन किया है। संवत shah बन्ध नहीं होता, अतः संवर बन्धका उलटा हुआ इस बातका ज्ञान करानेके लिए के बाद संवरका कथन किया है। संवरके होनेपर निर्जरा होती है, इसलिए संवरके पास निजरा कही है। मोक्ष अन्त में प्राप्त होता है, इसलिए उसका अन्तमें कथन किया है। 819. शंका-सूत्र में पुण्य और पापका ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि पदार्थ नौ हैं ऐसा दूसरे आचार्योंने भी कथन किया !! समाधान-पुण्य और पापका ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनका आस्रव और बन्धमें अन्तर्भाव हो जाता है। शंका-यदि ऐसा है तो सूत्रमें अलग से आस्रव आदिका ग्रहण करना निरर्थक है, क्योंकि उनका जीव और अजीव में अन्तर्भाव हो जाता है । समाधान —आस्रव आदिका ग्रहण करना निरर्थक नहीं है, क्योंकि यहाँ मोक्षका प्रकरण है इसलिए उसका कथन करना आवश्यक है । वह संसारपूर्वक होता है और संसारके प्रधान कारण आसव और बन्ध तथा मोक्षके प्रधान कारण संबर और निर्जरा हैं, अतः प्रधान हेतु, हेतुवाले और उनके फलके दिखलानेके लिए अलग-अलग उपदेश किया है। देखा भी जाता है कि किसी विशेषका सामान्य में अन्तर्भाव हो जाता है तो भी प्रयोजनके अनुसार उसका अलगसे ग्रहण किया जाता है । जैसे क्षत्रिय आये हैं और सूरवर्मा भी । यहाँ यद्यपि सूरवर्माका क्षत्रियोंमें अन्तर्भाव हो जाता है तो भी प्रयोजनके अनुसार उसका अलगसे ग्रहण किया है। इसी प्रकार प्रकृत में जानना चाहिए। 1. जीनः । स च आ. दि. 2 । 2. विप्रयोग-- मु. । मंच कत- मु.1 5. कुन्दकुन्दाद्ये 16 Jain Education International 3. -- त्यर्थं संवर-- आ., दि. 1, दि. 2 अ. । 4. व्यं योरास - मु. 17. -- षस्य यथोपयोगं पृथ - मु. । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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