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________________ सर्वार्थसिद्धि द्वितीय संस्करण पृ०-५० 214-24 पृ०-५० 219-32 पसातारूप कवायरहित । कषाय अर्थात् क्रोधादि कषायके रागवश प्रमादीका 246-18 240-20 241-26 247-26 258-34 252-25 पड़नेवाले काय तब भी योगवऋता स्वगत है और विसंवादन परगत है वे कर्मस्कन्ध प्रस्तुत संस्करण असाताके उदयरूप कषाय रहित । क्रोधादि कषाय कहलाते हैं। कषाय के रागवश स्नेहसिक्त होने का कारण प्रमादीका पड़नेवाले अनुपाय काय तब भी स्वगत योगवता कही जाती है और परगत विसंवादन वे आठ प्रकार की कर्मप्रकृतियों के योग्य कर्मस्कन्ध मन्त्यम् । अन्त्यं शुक्लम् । तत्सामी. अप्रिय है। विष समाधान - परिणामोंकी विशुद्धि द्वारा वृद्धि -स्वभाव अवितयं विभूति विशेष रूप 259-30 253-22 307-20 -मन्त्यम् । तत्सामीविष समाधान-वृद्धिको 341-11 342-21 356-27 315-35 351-11 352-19 367-27 368-23 ---स्वभावरूप केरल 357-25 2. परिशिष्ट-2 पृष्ठ 390 क्रमांक 17.1--- इसके अन्तर्गत 'तिरश्चीनां क्षायिकं नास्ति' इससे आगेका कथन भूल सर्वार्थसिद्धिका नहीं है यह इसीसे स्पष्ट है कि जो भी कृत्यकृत्यवेदक सम्यग्दृष्टि या क्षायिक सम्यग्दष्टि मरणकर चारों गतियों में उत्पन्न होता है वह प्रथम नरक को छोड़कर शेष तीन गेतियोंके पुरुषवेदियोंमें ही उत्पन्न होता है । वह न तो मरकर नपुंसकवेदियोंमें उत्पन्न होता है और न ही स्त्रीवेदियोंमें । यदि मूलमें 'ति:चीनां क्षायिकं नास्ति' यह वचन न होता तो भी कोई आपत्ति नहीं थी। परन्तु सभी हस्तलिखित प्रतियों में इस वचन के होनेसे हमने उसे मूल में यथावस्थित रखा है । इस वाक्यके रहने से भवान्तरकी अपेक्षा मनुष्यों में भी यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि कृत्यकृत्यवेदक सम्यग्दृष्टि और क्षायिक सम्यग्दृष्टि मरणकर मनुष्यनियों में नहीं उत्पन्न होता है इसका निर्देश करनेवाला वचन भी मूल में होना चाहिए था। परन्तु कोई भी सभ्यग्दृष्टि मरणकर प्रथम नरकको छोड़कर निरपवाद रूपसे पुरुषवेदियोंमें ही उत्पन्न होता है, अन्यमें नहीं.--इस कथन से ही उक्त कथनकी पुष्टि हो जाती है । पृ. 395 पंक्ति 29 में निन्यानवें लाखके आगे निन्यानवें हजारकी छूट है तथा यहाँ जो सर्वसंयतोंकी संख्या दी है वह उपशम श्रेणीके चार गुणस्थानोंमें से प्रत्येक मुणस्थानमें 299 तथा दक्षिण प्रतिपत्ति के अनुसार क्षपकके प्रत्येक गुणस्थानकी और अयोगिकेवलीकी संख्या 598 स्वीकार कर सब संयतोंकी संख्या 89999997 दी है । अतः प्रमत्तसंयतसे लेकर पूरी संख्याका योग 89999997 होता है । यथा-- प्रमत्तसंयत 59398206 1 अप्रमत्त संयत 29699103+चारों उपशमक 1196+चारों क्षपक 2392+सयोगकेवली 898502+ अयोगकेवली 598---89999997 । यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए कि उक्त पृष्ठ 395 पंक्ति 19 में जो "यदि कदाचित् एकस्मिन् समये संभवन्ति" यह कहा है सो संयतों की उक्त संख्या कभी भी एक समय में न जानकर विवक्षा विशेषसे यह संख्या कही है। कारण कि न तो उपशमणिके चारों गुणस्थानोंमें से प्रत्येक में एक ही समयमें अपने-अपने गुणस्थान की संख्या का प्राप्त होना सम्भव है और न क्षपकश्रेणिके चारों गुणस्थानों में से प्रत्येक में एक ही समय में अपने-अपने गुणस्थानकी संख्याका प्राप्त होना सम्भव है। हाँ, उपशमणि और क्षपकणिके प्रत्येक गणस्थानमें, क्रमसे अपने-अपने गुणस्थानकी संख्या का कालभेदसे प्राप्त होना अवश्य सम्भव है । कारण कि जो जीव आठ समयोंमें इन श्रेणियोंके आठवें गुणस्थानमें चढ़ वे ही अन्तर्मुहुर्त बाद नौवें गुणस्थानमें पहुँचते Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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